महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2113, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंपाकर मग्न हो जाता है अथवा उस स्थानसे नीचे गिर जाता है ।। ५ ।। सोऽयं मत्तोऽक्षद्यूतेन मधुवन्न परीक्षते । प्रपातं बुध्यते नैव वैरं कृत्वा महारथैः ।। ६ ।। वैसे ही यह दुर्योधन जूएके नशेमें इतना उन्मत्त हो गया है कि मधुमत्त पुरुषकी भाँति अपने ऊपर आनेवाले संकटको नहीं देखता। महारथी पाण्डवोंके साथ वैर करके हमें पतनके गर्तमें गिरकर मरना पड़ेगा, इस बातको समझ नहीं पा रहा है ।। ६ ।। विदितं मे महाप्राज्ञ भोजेष्वेवासमञ्जसम् । पुत्रं संत्यक्तवान् पूर्वं पौराणां हितकाम्यया ।। ७ ।। महाप्राज्ञ! मुझे मालूम है कि भोजवंशके एक नरेशने पूर्वकालमें पुरवासियोंके हितकी इच्छासे अपने कुमार्गगामी पुत्रका परित्याग कर दिया था ।। ७ ।। अन्धका यादवा भोजाः समेताः कंसमत्यजन् । नियोगात् तु हते तस्मिन् कृष्णेनामित्रघातिना ।। ८ ।। अन्धकों, यादवों और भोजोंने मिलकर कंसको त्याग दिया तथा उन्हींके आदेशसे शत्रुघाती श्रीकृष्णने उसको मार डाला ।। ८ ।। एवं ते ज्ञातयः सर्वे मोदमानाः शतं समाः । त्वन्नियुक्तः सव्यसाची निगृह्णातु सुयोधनम् ।। ९ ।। इस प्रकार उसके मारे जानेसे समस्त बन्धु-बान्धव सदाके लिये सुखी हो गये हैं। आप भी आज्ञा दें तो ये सव्यसाची अर्जुन इस दुर्योधनको बंदी बना ले सकते हैं ।। निग्रहादस्य पापस्य मोदन्तां कुरवः सुखम् । काकेनेमांश्चित्रबर्हान् शार्दूलान् क्रोष्टुकेन च । क्रीणीष्व पाण्डवान् राजन् मा मज्जीः शोकसागरे ।। १० ।। इसी पापीके कैद हो जानेसे समस्त कौरव सुख और आनन्दसे रह सकते हैं। राजन्! दुर्योधन कौवा है और पाण्डव मोर। इस कौवेको देकर आप विचित्र पंखोंवाले मयूरोंको खरीद लीजिये। इस गीदड़के द्वारा इन पाण्डवरूपी शेरोंको अपनाइये। शोकके समुद्रमें डूबकर प्राण न दीजिये ।। १० ।। त्यजेत् कुलार्थे पुरुषं ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् । ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ।। ११ ।। समूचे कुलकी भलाईके लिये एक मनुष्यको त्याग दे, गाँवके हितके लिये एक कुलको छोड़ दे, देशकी भलाईके लिये एक गाँवको त्याग दे और आत्माके उद्धारके लिये सारी पृथ्वीका ही परित्याग कर दे ।। ११ ।। सर्वज्ञः सर्वभावज्ञः सर्वशत्रुभयंकरः । इति स्म भाषते काव्यो जम्भत्यागे महासुरान् ।। १२ ।।