भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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स्वर्णभूषित विचित्र शैलपर देवता और गन्धर्व निवास करते हैं। उसका कोई माप नहीं है। जिनमें पापकी मात्रा अधिक है, ऐसे मनुष्य वहाँ पैर नहीं रख सकते ॥ ५-६ ॥ व्यालैरावारितं घोरैर्दिव्यौषधिविदीपितम् । नाकमावृत्य तिष्ठन्तमुच्छ्रयेण महागिरिम् ॥ ७ ॥ अगम्यं मनसाप्यन्यैर्नदीवृक्षसमन्वितम् । नानापतगसङ्घैश्च नादितं सुमनोहरैः ॥ ८ ॥ वहाँ सब ओर भयंकर सर्प भरे पड़े हैं। दिव्य ओषधियाँ उस तेजोमय पर्वतको और भी उद्भासित करती रहती हैं। वह महान् गिरिराज अपनी ऊँचाईसे स्वर्गलोकको घेरकर खड़ा है। प्राकृत मनुष्योंके लिये वहाँ मनसे भी पहुँचना असम्भव है। वह गिरिप्रदेश बहुत-सी नदियों और असंख्य वृक्षोंसे सुशोभित है। भिन्न-भिन्न प्रकारके अत्यन्त मनोहर पक्षियोंके समुदाय अपने कलरवसे उस पर्वतको कोलाहलपूर्ण किये रहते हैं ॥ ७-८ ॥ तस्य शृङ्गमपारुह्य बहुरत्नाचितं शुभम् । अनन्तकल्पमुद्विद्धं सुराः सर्वे महौजसः ॥ ९ ॥ ते मन्त्रयितुमारब्धास्तत्रासीना दिवौकसः । अमृताय समागम्य तपोनियमसंयुताः ॥ १० ॥ तत्र नारायणो देवो ब्रह्माणमिदमब्रवीत् । चिन्तयत्सु सुरेष्वेवं मन्त्रयत्सु च सर्वशः ॥ ११ ॥ देवैरसुरसङ्घैश्च मथ्यतां कलशोदधिः । भविष्यत्यमृतं तत्र मथ्यमाने महोदधौ ॥ १२ ॥ उसके शुभ एवं उच्चतम शृंग असंख्य चमकीले रत्नोंसे व्याप्त हैं। वे अपनी विशालताके कारण आकाशके समान अनन्त जान पड़ते हैं। समस्त महातेजस्वी देवता मेरुगिरिके उस महान् शिखरपर चढ़कर एक स्थानमें बैठ गये और सब मिलकर अमृत-प्राप्तिके लिये क्या उपाय किया जाय, इसका विचार करने लगे। वे सभी तपस्वी तथा शौच-संतोष आदि नियमोंसे संयुक्त थे। इस प्रकार परस्पर विचार एवं सबके साथ मन्त्रणामें लगे हुए देवताओंके समुदायमें उपस्थित हो भगवान् नारायणने ब्रह्माजीसे यों कहा—‘समस्त देवता और असुर मिलकर महासागरका मन्थन करें। उस महासागरका मन्थन आरम्भ होनेपर उसमेंसे अमृत प्रकट होगा ॥ ९—१२ ॥ सर्वौषधीः समावाप्य सर्वरत्नानि चैव ह । मन्थध्वमुदधिं देवा वेत्स्यध्वममृतं ततः ॥ १३ ॥ ‘देवताओ! पहले समस्त ओषधियों, फिर सम्पूर्ण रत्नोंको पाकर भी समुद्रका मन्थन जारी रखो। इससे अन्तमें तुमलोगोंको निश्चय ही अमृतकी प्राप्ति होगी’ ॥ १३ ॥