भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2154

'भूमिपालो! द्रौपदीने जो प्रश्न उपस्थित किया है, उसका आपलोग उत्तर दें। यदि इसके प्रश्नका ठीक-ठीक विवेचन नहीं किया गया, तो हमें शीघ्र ही नरक भोगना पड़ेगा ।। १२ ।।

भीष्मश्च धृतराष्ट्रश्च कुरुवृद्धतमावुभौ । समेत्य नाहुतः किंचिद् विदुरश्च महामतिः ॥ १३ ॥ 'पितामह भीष्म और पिता धृतराष्ट्र—ये दोनों कुरुवंशके सबसे वृद्ध पुरुष हैं। ये तथा परम बुद्धिमान् विदुरजी मिलकर कुछ उत्तर क्यों नहीं देते?' ।। १३ ।।

भारद्वाजश्च सर्वेषामाचार्यः कृप एव च। कुत एतावपि प्रश्नं नाहतुर्द्विजसत्तमौ ॥ १४ ॥ 'हम सबके आचार्य भरद्वाजनन्दन द्रोणाचार्य और कृपाचार्य ये दोनों ब्राह्मणकुलके श्रेष्ठ पुरुष हैं। ये दोनों भी इस प्रश्नपर अपने विचार क्यों नहीं प्रकट करते? ।।

ये त्वन्ये पृथिवीपालाः समेताः सर्वतो दिशः। कामक्रोधौ समुत्सृज्य ते ब्रुवन्तु यथामति ॥ १५ ॥ 'जो दूसरे राजालोग चारों दिशाओंसे यहाँ पधारे हैं, वे सभी काम और क्रोधको त्यागकर अपनी बुद्धिके अनुसार इस प्रश्नका उत्तर दें ।। १५ ।।

यदिदं द्रौपदीवाक्यमुक्तवत्यसकृच्छुभा। विमृश्य कस्य कः पक्षः पार्थिवा वदतोत्तरम् ॥ १६ ॥ राजाओ! कल्याणी द्रौपदीने बार-बार जिस प्रश्नको दुहराया है, उसपर विचार करके आपलोग उत्तर दें, जिससे मालूम हो जाय कि इस विषयमें किसका क्या पक्ष (विचार) है' ।। १६ ।।

एवं स बहुशः सर्वानुक्तवांस्तान् सभासदः । न च ते पृथिवीपालास्तमूचुः साध्वसाधु वा ॥ १७ ॥ इस प्रकार विकर्णने उन सब सभासदोंसे बार-बार अनुरोध किया; परंतु उन नरेशोंने उस विषयमें उससे भला-बुरा कुछ नहीं कहा ।। १७ ।।

उक्त्वा सकृत् तथा सर्वान् विकर्णः पृथिवीपतीन्। पाणौ पाणिं विनिष्पिष्य निःश्वसन्निदमब्रवीत् ॥ १८ ॥ उन सब राजाओंसे बार-बार आग्रह करनेपर भी जब कुछ उत्तर नहीं मिला, तब विकर्णने हाथ-पर-हाथ मलते हुए लंबी साँस खींचकर कहा— ।। १८ ।।

विब्रूत पृथिवीपाला वाक्यं मा वा कथंचन । मन्ये न्याय्यं यदत्राहं तद्धि वक्ष्यामि कौरवाः ॥ १९ ॥ 'कौरवो तथा अन्य भूमिपालो! आपलोग द्रौपदीके प्रश्नपर किसी प्रकारका विचार प्रकट करें या न करें, मैं इस विषयमें जो न्यायसंगत समझता हूँ, वह कहता हूँ।।

चत्वार्याहुर्नरश्रेष्ठा व्यसनानि महीक्षिताम्। मृगयां पानमक्षांश्च ग्राम्ये चैवातिरक्तताम् ॥ २० ॥