महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआकृष्यमाणे वसने द्रौपद्याश्चिन्तितो हरिः । वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! जब वस्त्र खींचा जाने लगा, तब द्रौपदीने भगवान् श्रीकृष्णका स्मरण किया ।।
(द्रौपद्युवाच
ज्ञातं मया वसिष्ठेन पुरा गीतं महात्मना । महत्यापदि सम्प्राप्ते स्मर्तव्यो भगवान् हरिः ।। द्रौपदीने मन-ही-मन कहा— मैंने पूर्वकालमें महात्मा वसिष्ठजीकी बतायी हुई इस बातको अच्छी तरह समझा है कि भारी विपत्ति पड़नेपर भगवान् श्रीहरिका स्मरण करना चाहिये।
वैशम्पायन उवाच
गोविन्देति समाभाष्य कृष्णेति च पुनः पुनः । मनसा चिन्तयामास देवं नारायणं प्रभुम् ।। आपत्स्वभयदं कृष्णं लोकानां प्रपितामहम् ।) वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! ऐसा विचारकर द्रौपदीने बारंबार 'गोविन्द' और 'कृष्ण' का नाम लेकर पुकारा और आपत्तिकालमें अभय देनेवाले लोकप्रपितामह नारायण-स्वरूप भगवान् श्रीकृष्णका मन-ही-मन चिन्तन किया।
गोविन्द द्वारकावासिन् कृष्ण गोपीजनप्रिय ।। ४१ ।। कौरवैः परिभूतां मां किं न जानासि केशव । हे नाथ हे रमानाथ व्रजनाथार्तिनाशन । कौरवार्णवमग्नां मामुद्धरस्व जनार्दन ।। ४२ ।। 'हे गोविन्द! हे द्वारकावासी श्रीकृष्ण! हे गोपांगनाओंके प्राणवल्लभ केशव! कौरव मेरा अपमान कर रहे हैं, क्या आप नहीं जानते? हे नाथ! हे रमानाथ! हे व्रजनाथ! हे संकटनाशन जनार्दन! मैं कौरवरूप समुद्रमें डूबी जा रही हूँ, मेरा उद्धार कीजिये ।। ४१-४२ ।।
कृष्ण कृष्ण महायोगिन् विश्वात्मन् विश्वभावन । प्रपन्नां पाहि गोविन्द कुरुमध्येऽवसीदतीम् ।। ४३ ।। 'सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण! महायोगिन्! विश्वात्मन्! विश्वभावन! गोविन्द! कौरवोंके बीचमें कष्ट पाती हुई मुझ शरणागत अबलाकी रक्षा कीजिये' ।। ४३ ।।
इत्यनुस्मृत्य कृष्णं सा हरिं त्रिभुवनेश्वरम् । प्रारुदद् दुःखिता राजन् मुखमाच्छाद्य भामिनी ।। ४४ ।। राजन्! इस प्रकार तीनों लोकोंके स्वामी श्यामसुन्दर श्रीकृष्णका बार-बार चिन्तन करके मानिनी द्रौपदी दुःखी हो अंचलसे मुँह ढककर जोर-जोरसे रोने लगी ।। ४४ ।।