महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभीष्म उवाच
उक्तवानस्मि कल्याणि धर्मस्य परमा गतिः । लोके न शक्यते ज्ञातुमपि विज्ञैर्महात्मभिः ॥ १४ ॥ भीष्मजीने कहा— कल्याणि! मैं पहले ही कह चुका हूँ कि धर्मकी गति बड़ी सूक्ष्म है। लोकमें विज्ञ महात्मा भी उसे ठीक-ठीक नहीं जान सकते ॥ १४ ॥
बलवांश्च यथा धर्मं लोके पश्यति पूरुषः । स धर्मो धर्मवेलायां भवत्यभिहतः परः ॥ १५ ॥ संसारमें बलवान् मनुष्य जिसको धर्म समझता है, धर्मविचारके समय लोग उसीको धर्म मान लेते हैं और बलहीन पुरुष जो धर्म बतलाता है, वह बलवान् पुरुषके बताये धर्मसे दब जाता है (अतः इस समय कर्ण और दुर्योधनका बताया हुआ धर्म ही सर्वोपरि हो रहा है) ॥ १५ ॥
न विवेक्तुं च ते प्रश्नमिमं शक्नोमि निश्चयात् । सूक्ष्मत्वाद गहनत्वाच्च कार्यस्यास्य च गौरवात् ॥ १६ ॥ मैं तो धर्मका स्वरूप सूक्ष्म और गहन होनेके कारण तथा इस धर्मनिर्णयके कार्यके अत्यन्त गुरुतर होनेसे तुम्हारे इस प्रश्नका निश्चितरूपसे यथार्थ विवेचन नहीं कर सकता ॥
नूनमन्तः कुलस्यायं भविता नचिरादिव । तथा हि कुरवः सर्वे लोभमोहपरायणाः ॥ १७ ॥ अवश्य ही बहुत शीघ्र इस कुलका नाश होनेवाला है; क्योंकि समस्त कौरव लोभ और मोहके वशीभूत हो गये हैं ॥ १७ ॥
कुलेषु जाताः कल्याणि व्यसनैराहता भृशम् । धर्म्यान्मार्गान्न च्यवन्ते येषां नस्त्वं वधूः स्थिता ॥ १८ ॥ कल्याणि! तुम जिनकी पत्नी हो, वे पाण्डव हमारे उत्तम कुलमें उत्पन्न हैं और भारी-से-भारी संकटमें पड़कर भी धर्मके मार्गसे विचलित नहीं होते हैं ॥ १८ ॥
उपपन्नं च पाञ्चालि तवेदं वृत्तमीदृशम् । यत् कृच्छ्रमपि सम्प्राप्ता धर्ममेवान्ववेक्षसे ॥ १९ ॥ पांचालराजकुमारी! तुम्हारा यह आचार-व्यवहार तुम्हारे योग्य ही है; क्योंकि भारी संकटमें पड़कर भी तुम धर्मकी ओर ही देख रही हो ॥ १९ ॥
एते द्रोणादयश्चैव वृद्धा धर्मविदो जनाः । शून्यैः शरीरैस्तिष्ठन्ति गतासव इवानताः ॥ २० ॥ युधिष्ठिरस्तु प्रश्नेऽस्मिन् प्रमाणमिति मे मतिः । अजितां वा जितां वेति स्वयं व्याहर्तुमर्हति ॥ २१ ॥ ये द्रोणाचार्य आदि वृद्ध एवं धर्मज्ञ पुरुष भी सिर लटकाये शून्य शरीरसे इस प्रकार बैठे हैं; मानो निष्प्राण हो गये हों। मेरी राय यह है कि इस प्रश्नका निर्णय करनेके लिये धर्मराज