भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 218

ब्रह्मन्! इस प्रकार पूर्वकालमें देवताओं, दैत्यों और दानवोंने मन्दराचलको मथानी और वासुकि नागको डोरी बनाकर अमृतके लिये जलनिधि समुद्रको मथना आरम्भ किया। उन महान् असुरोंने नागराज वासुकिके मुखभागको दृढ़तापूर्वक पकड़ रखा था और जिस ओर उसकी पूँछ थी उधर सम्पूर्ण देवता उसे पकड़कर खड़े थे ।। १३-१४ १/२ ।।

अनन्तो भगवान् देवो यतो नारायणस्ततः । शिर उत्क्षिप्य नागस्य पुनः पुनरवाक्षिपत् ।। १५ ।। भगवान् अनन्तदेव उधर ही खड़े थे, जिधर भगवान् नारायण थे। वे वासुकि नागके सिरको बार-बार ऊपर उठाकर झटकते थे ।। १५ ।।

वासुकेरथ नागस्य सहसाऽऽक्षिप्यतः सुरैः । सधूमाः सार्चिषो वाता निष्पेतुरसकृन्मुखात् ।। १६ ।। तब देवताओंद्धारा बार-बार खींचे जाते हुए वासुकि नागके मुखसे निरन्तर धूएँ तथा आगकी लपटोंके साथ गर्म-गर्म साँसें निकलने लगीं ।। १६ ।।

ते धूमसङ्घाः सम्भूता मेघसङ्घाः सविद्युतः । अभ्यवर्षन् सुरगणान् श्रमसंतापकशितान् ।। १७ ।। वे धूमसमुदाय बिजलियोंसहित मेघोंकी घटा बनकर परिश्रम एवं संतापसे कष्ट पानेवाले देवताओंपर जलकी धारा बरसाते रहते थे ।। १७ ।।

तस्माच्च गिरिकूटाग्रात् प्रच्युताः पुष्पवृष्टयः । सुरासुरगणान् सर्वान् समन्तात् समवाकिरन् ।। १८ ।। उस पर्वतशिखरके अग्रभागसे सम्पूर्ण देवताओं तथा असुरोंपर सब ओरसे फूलोंकी वर्षा होने लगी ।। १८ ।।

बभूवात्र महानादो महामेघरवोपमः । उदधेर्मथ्यमानस्य मन्दरेण सुरासुरैः ।। १९ ।। देवताओं और असुरोंद्वारा मन्दराचलसे समुद्रका मन्थन होते समय वहाँ महान् मेघोंकी गम्भीर गर्जनाके समान जोर-जोरसे शब्द होने लगा ।। १९ ।।

तत्र नाना जलचरा विनिष्पिष्टा महाद्रिणा । विलयं समुपाजग्मुः शतशो लवणाम्भसि ।। २० ।। उस समय उस महान् पर्वतके द्वारा सैकड़ों जलचर जन्तु पिस गये और खारे पानीके उस महासागरमें विलीन हो गये ।। २० ।।

वारुणानि च भूतानि विविधानि महीधरः । पातालतलवासीनि विलयं समुपानयत् ।। २१ ।। मन्दराचलने वरुणालय (समुद्र) तथा पातालतलमें निवास करनेवाले नाना प्रकारके प्राणियोंका संहार कर डाला ।। २१ ।।

तस्मिंश्च भ्राम्यमाणेऽद्रौ संघृष्यन्तः परस्परम् ।