भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 2189

जो पुरुष वैरको याद नहीं रखते, गुणोंको ही देखते हैं, अवगुणोंको नहीं तथा किसीसे विरोध नहीं रखते, वे ही उत्तम पुरुष कहे गये हैं। साधु पुरुष दूसरोंके सत्कर्मों (उपकारादि)-को ही याद रखते हैं, उनके किये हुए वैरको नहीं। वे दूसरोंकी भलाई तो करते हैं; परंतु उनसे बदला लेनेकी भावना नहीं रखते ।। ६-७ ।। संवादे परुषान्याहुर्युधिष्ठिर नराधमाः । प्रत्याहुर्मध्यमास्त्वेतेऽनुक्ताः परुषमुत्तरम् ।। ८ ।। न चोक्ता नैव चानुक्तास्त्वहिताः परुषा गिरः । प्रतिजल्पन्ति वै धीराः सदा तूत्तमपूरुषाः ।। ९ ।। युधिष्ठिर! नीच मनुष्य साधारण बातचीतमें भी कटुवचन बोलने लगते हैं। जो स्वयं पहले कटु वचन न कहकर प्रत्युत्तरमें कठोर बातें कहते हैं, वे मध्यम श्रेणीके पुरुष हैं। परंतु जो धीर एवं श्रेष्ठ पुरुष हैं, वे किसीके कटुवचन बोलने या न बोलनेपर भी अपने मुखसे कभी कठोर एवं अहितकर बात नहीं निकालते ।। ८-९ ।। स्मरन्ति सुकृतान्येव न वैराणि कृतान्यपि । सन्तः प्रतिविजानन्तो लब्ध्वा प्रत्ययमात्मनः ।। १० ।। महात्मा पुरुष अपने अनुभवको सामने रखकर दूसरोंके सुख-दुःखको भी अपने समान जानते हुए उनके अच्छे बर्तावोंको ही याद रखते हैं, उनके द्वारा किये हुए वैर-विरोधको नहीं ।। १० ।। असम्भिन्नार्थमर्यादाः साधवः प्रियदर्शनाः । तथा चरितमार्येण त्वयास्मिन् सत्समागमे ।। ११ ।। सत्पुरुष आर्यमर्यादाको कभी भंग नहीं करते। उनके दर्शनसे सभी लोग प्रसन्न हो जाते हैं। युधिष्ठिर! कौरव-पाण्डवोंके समागममें तुमने श्रेष्ठ पुरुषोंके समान ही आचरण किया है ।। ११ ।। दुर्योधनस्य पारुष्यं तत् तात हृदि मा कृथाः । मातरं चैव गान्धारीं मां च त्वं गुणकाङ्क्षया ।। १२ ।। उपस्थितं वृद्धमन्धं पितरं पश्य भारत । तात! दुर्योधनने जो कठोर बर्ताव किया है, उसे तुम अपने हृदयमें मत लाना। भारत! तुम तो उत्तम गुण ग्रहण करनेकी इच्छासे अपनी माता गान्धारी तथा यहाँ बैठे हुए मुझ अंधे बूढ़े ताऊकी ओर देखो ।। १२ १/२ ।। प्रेक्षापूर्वं मया द्यूतमिदमासीदुपेक्षितम् ।। १३ ।। मित्राणि द्रष्टुकामेन पुत्राणां च बलाबलम् । अशोच्याः कुरवो राजन् येषां त्वमनुशासिता ।। १४ ।। मन्त्री च विदुरो धीमान् सर्वशास्त्रविशारदः ।