महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंये मेरे पुत्र उत्तम धर्म, महात्मा पुरुषोंके शील-स्वभाव, यश और पराक्रमका अनुसरण करनेवाले हैं, अतः कष्ट भोगनेके योग्य नहीं हैं; भगवन्! इनपर तो दया करो ॥ २५ ॥
सेयं नीत्यर्थविज्ञेषु भीष्मद्रोणकृपादिषु ।
स्थितेषु कुलनाथेषु कथमापदुपागता ॥ २६ ॥
नीतिके अर्थको जाननेवाले परम विद्वान् भीष्म, द्रोण और कृपाचार्य आदिके, जो इस कुलके रक्षक हैं, उनके रहते हुए यह विपत्ति हमपर क्यों आयी? ॥ २६ ॥
हा पाण्डो हा महाराज क्वासि किं समुपेक्षसे ।
पुत्रान् विवास्यतः साधूनरिभिर्धूतनिर्जितान् ॥ २७ ॥
हा महाराज पाण्डु! कहाँ हो? आज तुम्हारे श्रेष्ठ पुत्रोंको शत्रुओंने जूएमें जीतकर वनवास दे दिया है, तुम क्यों इनकी दुरवस्थाकी उपेक्षा कर रहे हो? ॥ २७ ॥
सहदेव निवर्तस्व ननु त्वमसि मे प्रियः ।
शरीरादपि माद्रेय मा मा त्याक्षीः कुपुत्रवत् ॥ २८ ॥
माद्रीनन्दन सहदेव! तुम मुझे अपने शरीरसे भी अधिक प्रिय हो। बेटा! लौट आओ। कुपुत्रकी भाँति मेरा त्याग न करो ॥ २८ ॥
व्रजन्तु भ्रातरस्तेऽमी यदि सत्याभिसंधिनः ।
मत्परित्राणजं धर्ममिहैव त्वमवाप्नुहि ॥ २९ ॥
तुम्हारे ये भाई यदि सत्यधर्मके पालनका आग्रह रखकर वनमें जा रहे हैं तो जायें; तुम यहीं रहकर मेरी रक्षाजनित धर्मका लाभ लो ॥ २९ ॥
एवं विलपतीं कुन्तीमभिवाद्य प्रणम्य च ।
पाण्डवा विगतानन्दा वनायैव प्रवव्रजुः ॥ ३० ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**इस प्रकार विलाप करती हुई माता कुन्तीको अभिवादन एवं प्रणाम करके पाण्डवलोग दुःखी हो वनको चले गये ॥ ३० ॥
विदुरश्चापि तामार्तां कुन्तीमाश्वास्य हेतुभिः ।
प्रावेशयद् गृहं क्षत्ता स्वयमार्ततरः शनैः ॥ ३१ ॥
विदुरजी शोकाकुला कुन्तीको अनेक प्रकारकी युक्तियोंद्वारा धीरज बँधाकर उन्हें धीरे-धीरे अपने घर ले गये। उस समय वे स्वयं भी बहुत दुःखी थे ॥ ३१ ॥