भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2239

अब भीमसेन जिस प्रकार चल रहे हैं, उसका रहस्य बताता हूँ, सुनिये! भरतश्रेष्ठ! उन्हें इस बातका अभिमान है कि बाहुबलमें मेरे समान दूसरा कोई नहीं है ।। १३ ।।
बाहू विशालौ कृत्वासौ तेन भीमोऽपि गच्छति ।
बाहू विदशर्यन् राजन् बाहुद्रविणदर्पितः ।। १४ ।।
चिकीर्षन् कर्म शत्रुभ्यो बाहुद्रव्यानुरूपतः ।
इसीलिये वे अपनी विशाल भुजाओंकी ओर देखते हुए यात्रा करते हैं। राजन्! अपने बाहुबलरूपी वैभवपर उन्हें गर्व है। अतः वे अपनी दोनों भुजाएँ दिखाते हुए शत्रुओंसे बदला लेनेके लिये अपने बाहुबलके अनुरूप ही पराक्रम करना चाहते हैं ।। १४ १/२ ।।
प्रदिशञ्छरसम्पातान् कुन्तीपुत्रोऽर्जुनस्तदा ।। १५ ।।
सिकता वपन् सव्यसाची राजानमनुगच्छति ।
असक्ताः सिकतास्तस्य यथा सम्प्रति भारत ।
असक्तं शरवर्षाणि तथा मोक्ष्यति शत्रुषु ।। १६ ।।
कुन्तीपुत्र सव्यसाची अर्जुन उस समय राजाके पीछे-पीछे जो बालू बिखेरते हुए यात्रा कर रहे थे, उसके द्वारा वे शत्रुओंपर बाण बरसानेकी अभिलाषा व्यक्त करते थे। भारत! इस समय उनके गिराये हुए बालूके कण जैसे आपसमें संसक्त न होते हुए लगातार गिरते हैं, उसी प्रकार वे शत्रुओंपर परस्पर संसक्त न होनेवाले असंख्य बाणोंकी वर्षा करेंगे ।। १५-१६ ।।
न मे कश्चिद् विजानीयान्मुखमद्येति भारत ।
मुखमालिप्य तेनासौ सहदेवोऽपि गच्छति ।। १७ ।।
भारत! 'आज इस दुर्दिनमें कोई मेरे मुँहको पहचान न ले' यही सोचकर सहदेव अपने मुँहमें मिट्टी पोतकर जा रहे हैं ।। १७ ।।
नाहं मनांस्याददेयं मार्गे स्त्रीणामिति प्रभो ।
पांसुलिप्तसर्वाङ्गो नकुलस्तेन गच्छति ।। १८ ।।
प्रभो! 'मार्गमें मैं स्त्रियोंका चित्त न चुरा लूँ' इस भयसे नकुल अपने सारे अंगोंमें धूल लगाकर यात्रा करते हैं ।। १८ ।।
एकवस्त्रा प्ररुदती मुक्तकेशी रजस्वला ।
शोणितेनाक्तवसना द्रौपदी वाक्यमब्रवीत् ।। १९ ।।
द्रौपदीके शरीरपर एक ही वस्त्र था, उसके बाल खुले हुए थे, वह रजस्वला थी और उसके कपड़ोंमें रक्त (रज)-का दाग लगा हुआ था, उसने रोते हुए यह बात कही थी ।। १९ ।।
यत्कृतेऽहमिदं प्राप्ता तेषां वर्षे चतुर्दशे ।
हतपतयो हतसुता हतबन्धुजनप्रियाः ।। २० ।।
बहुशोणितदिग्धाङ्ग्यो मुक्तकेशयो रजस्वलाः ।