महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘भरतवंशशिरोमणे! अतः पाण्डवोंके साथ आपको शान्ति ही बनाये रखनी चाहिये। दोनों पक्षोंके लिये यही उचित है। आप निःशंक होकर यही उपाय करें ।। ३७ ।।
एवं कृते महाराज परं श्रेयस्त्वमाप्स्यसि ।
एवं गावलगणे क्षत्ता धर्मार्थसहितं वचः ।। ३८ ।।
उक्तवान् न गृहीतं वै मया पुत्रहितैषिणा ।। ३९ ।।
‘महाराज! ऐसा करनेपर आप परम कल्याणके भागी होंगे।’ संजय! इस प्रकार विदुरने मुझसे धर्म और अर्थयुक्त बातें कही थीं; किंतु पुत्रका हित चाहनेवाला होकर भी मैंने उनकी बात नहीं मानी ।। ३८-३९ ।।
इति श्रीमहाभारते शतसाहस्र्यां संहितायां वैयासिक्यां सभापर्वणि अनुद्यूतपर्वणि धृतराष्ट्रसंजयसंवादे एकाशीतितमोऽध्यायः ।। ८१ ।।
इस प्रकार व्यासनिर्मित श्रीमहाभारतनामक एक लाख श्लोकोंकी संहितामें सभापर्वके अन्तर्गत अनुद्यूतपर्वमें धृतराष्ट्रसंजयसंवादविषयक इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८१ ।।
(सभापर्व सम्पूर्णम्)
| अनुष्टुप् छन्द | ( अन्य बड़े छन्द ) | बड़े छन्दोंको ३२ अक्षरोंके अनुष्टुप् मानकर गिननेपर | कुलयोग | |
|---|---|---|---|---|
| उत्तरभारतीय पाठसे लिये गये श्लोक— | २५९५ ॥ | ( १५७ ) | २१७ ॥ = | २८१३ = |
| दक्षिणभारतीय पाठसे लिये गये श्लोक— | १२४२ | ( १ ) | १ । = | १२४३ । = |
सभापर्वकी पूर्ण श्लोकसंख्या—४०५६ ॥