महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगभस्तिभिर्भानुरिवावभाससे । समाक्षिपन् भानुमतः प्रभां मुहु- स्त्वमन्तकः सर्वमिदं ध्रुवाध्रुवम् ॥ २० ॥ आप उत्तम हैं। जैसे सूर्य अपनी किरणोंसे सबको प्रकाशित करता है, उसी प्रकार आप इस सम्पूर्ण जगत्को प्रकाशित करते हैं। आप ही सबका अन्त करनेवाले काल हैं और बारम्बार सूर्यकी प्रभाका उपसंहार करते हुए इस समस्त क्षर और अक्षररूप जगत्का संहार करते हैं ॥ २० ॥
दिवाकरः परिकुपितो यथा दहेत् प्रजास्तथा दहसि हुताशनप्रभ । भयंकरः प्रलय इवाग्निरुत्थितो विनाशयन् युगपरिवर्तनान्तकृत् ॥ २१ ॥ अग्निके समान प्रकाशित होनेवाले देव! जैसे सूर्य क्रुद्ध होनेपर सबको जला सकते हैं, उसी प्रकार आप भी कुपित होनेपर सम्पूर्ण प्रजाको दग्ध कर डालते हैं। आप युगान्तकारी कालके भी काल हैं और प्रलयकालमें सबका विनाश करनेके लिये भयंकर संवर्तकाग्निके रूपमें प्रकट होते हैं ॥ २१ ॥
खगेश्वरं शरणमुपागता वयं महौजसं ज्वलनसमानवर्चसम् । तडित्प्रभं वितिमिरमभ्रगोचरं महाबलं गरुडमुपेत्य खेचरम् ॥ २२ ॥ आप सम्पूर्ण पक्षियों एवं जीवोंके अधीश्वर हैं। आपका ओज महान् है। आप अग्निके समान तेजस्वी हैं। आप बिजलीके समान प्रकाशित होते हैं। आपके द्वारा अज्ञानपुंजका निवारण होता है। आप आकाशमें मेघोंकी भाँति विचरनेवाले महापराक्रमी गरुड हैं। हम यहाँ आकर आपके शरणागत हो रहे हैं ॥ २२ ॥
परावरं वरदमजय्यविक्रमं तवौजसा सर्वमिदं प्रतापितम् । जगत्प्रभो तप्तसुवर्णवर्चसा त्वं पाहि सर्वांश्च सुरान् महात्मनः ॥ २३ ॥ आप ही कार्य और कारणरूप हैं। आपसे ही सबको वर मिलता है। आपका पराक्रम अजेय है। आपके तेजसे यह सम्पूर्ण जगत् संतप्त हो उठा है। जगदीश्वर! आप तपाये हुए सुवर्णके समान अपने दिव्य तेजसे सम्पूर्ण देवताओं और महात्मा पुरुषोंकी रक्षा करें ॥ २३ ॥
भयान्विता नभसि विमानगामिनो विमानिता विपथगतिं प्रयान्ति ते ।