भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 248

अपने पुत्रोंको इस दशामें देखकर कद्रू इन्द्रकी स्तुति करने लगी—'सम्पूर्ण देवताओंके ईश्वर! तुम्हें नमस्कार है। बलसूदन! तुम्हें नमस्कार है ॥ ७ ॥ नमुचिघ्न नमस्तेऽस्तु सहस्राक्ष शचीपते । सर्पाणां सूर्यतप्तानां वारिणा त्वं प्लवो भव ॥ ८ ॥ 'सहस्र नेत्रोंवाले नमुचिनाशन! शचीपते! तुम्हें नमस्कार है। तुम सूर्यके तापसे संतप्त हुए सर्पोंको जलसे नहलाकर नौकाकी भाँति उनके रक्षक हो जाओ ॥ ८ ॥ त्वमेव परमं त्राणमस्माकममरोत्तम । ईशो ह्यसि पयः स्रष्टुं त्वमनल्पं पुरन्दर ॥ ९ ॥ 'अमरोत्तम! तुम्हीं हमारे सबसे बड़े रक्षक हो । पुरन्दर! तुम अधिक-से-अधिक जल बरसानेकी शक्ति रखते हो ॥ ९ ॥ त्वमेव मेघस्त्वं वायुस्त्वमग्निर्विद्युतोऽम्बरे । त्वमभ्रगणविक्षेप्ता त्वामेवाहुर्महाघनम् ॥ १० ॥ 'तुम्हीं मेघ हो, तुम्हीं वायु हो और तुम्हीं आकाशमें बिजली बनकर प्रकाशित होते हो। तुम्हीं बादलोंको छिन्न-भिन्न करनेवाले हो और विद्वान् पुरुष तुम्हें ही महामेघ कहते हैं ॥ १० ॥ त्वं वज्रमतुलं घोरं घोषवांस्त्वं बलाहकः । स्रष्टा त्वमेव लोकानां संहर्ता चापराजितः ॥ ११ ॥ 'संसारमें जिसकी कहीं तुलना नहीं है, वह भयानक वज्र तुम्हीं हो, तुम्हीं भयंकर गर्जना करनेवाले बलाहक (प्रलयकालीन मेघ) हो। तुम्हीं सम्पूर्ण लोकोंकी सृष्टि और संहार करनेवाले हो। तुम कभी परास्त नहीं होते ॥ ११ ॥ त्वं ज्योतिः सर्वभूतानां त्वमादित्यो विभावसुः । त्वं महद्भूतमाश्चर्यं त्वं राजा त्वं सुरोत्तमः ॥ १२ ॥ 'तुम्हीं समस्त प्राणियोंकी ज्योति हो। सूर्य और अग्नि भी तुम्हीं हो। तुम आश्चर्यमय महान् भूत हो, तुम राजा हो और तुम देवताओंमें सबसे श्रेष्ठ हो ॥ १२ ॥ त्वं विष्णुस्त्वं सहस्राक्षस्त्वं देवस्त्वं परायणम् । त्वं सर्वममृतं देव त्वं सोमः परमार्चितः ॥ १३ ॥ 'तुम्हीं सर्वव्यापी विष्णु, सहस्रलोचन इन्द्र, द्युतिमान् देवता और सबके परम आश्रय हो। देव! तुम्हीं सब कुछ हो। तुम्हीं अमृत हो और तुम्हीं परम पूजित सोम हो ॥ १३ ॥ त्वं मुहूर्तस्तिथिस्त्वं च त्वं लवस्त्वं पुनः क्षणः । शुक्लस्त्वं बहुलस्त्वं च कला काष्ठा त्रुटिस्तथा । संवत्सरर्तवो मासा रजन्यश्च दिनानि च ॥ १४ ॥ 'तुम मुहूर्त हो, तुम्हीं तिथि हो, तुम्हीं लव तथा तुम्हीं क्षण हो। शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष भी तुमसे भिन्न नहीं हैं। कला, काष्ठा और त्रुटि सब तुम्हारे ही स्वरूप हैं। संवत्सर, ऋतु,