भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 260

वितत्य पक्षावाकाशमुत्पपात मनोजवः ॥ ६ ॥
भार्यासहित उस ब्राह्मणके निकल जानेपर पक्षिराज गरुड पंख फैलाकर मनके समान तीव्र वेगसे आकाशमें उड़े ॥ ६ ॥

ततोऽपश्यत् स पितरं पृष्टश्चाख्यातवान् पितुः ।
यथान्यायममेयात्मा तं चोवाच महर्षिः ॥ ७ ॥
तदनन्तर उन्हें अपने पिता कश्यपजीका दर्शन हुआ। उनके पूछनेपर अमेयात्मा गरुडने पितासे यथोचित कुशल-समाचार कहा। महर्षि कश्यप उनसे इस प्रकार बोले ॥ ७ ॥

कश्यप उवाच

कच्चिद् वः कुशलं नित्यं भोजने बहुलं सुत ।
कच्चिच्च मानुषे लोके तवान्नं विद्यते बहु ॥ ८ ॥
**कश्यपजीने पूछा—**बेटा! तुमलोग कुशलसे तो हो न? विशेषतः प्रतिदिन भोजनके सम्बन्धमें तुम्हें विशेष सुविधा है न? क्या मनुष्यलोकमें तुम्हारे लिये पर्याप्त अन्न मिल जाता है ॥ ८ ॥

गरुड उवाच

माता मे कुशला शाश्वत् तथा भ्राता तथा ह्यहम् ।
न हि मे कुशलं तात भोजने बहुले सदा ॥ ९ ॥
**गरुडने कहा—**मेरी माता सदा कुशलसे रहती हैं। मेरे भाई तथा मैं दोनों सकुशल हैं। परंतु पिताजी! पर्याप्त भोजनके विषयमें तो सदा मेरे लिये कुशलका अभाव ही है ॥ ९ ॥

अहं हि सर्पैः प्रहितः सोममाहर्तुमुत्तमम् ।
मातुर्दास्यविमोक्षार्थमाहरिष्ये तमद्य वै ॥ १० ॥
मुझे सर्पोंने उत्तम अमृत लानेके लिये भेजा है। माताको दासीपनसे छुटकारा दिलानेके लिये आज मैं निश्चय ही उस अमृतको लाऊँगा ॥ १० ॥

मात्रा चात्र समादिष्टो निषादान् भक्षयेति ह ।
न च मे तृप्तिरभवद् भक्षयित्वा सहस्रशः ॥ ११ ॥
भोजनके विषयमें पूछनेपर माताने कहा—‘निषादोंका भक्षण करो’, परंतु हजारों निषादोंको खा लेनेपर भी मुझे तृप्ति नहीं हुई है ॥ ११ ॥

तस्माद् भक्ष्यं त्वमपरं भगवन् प्रदिशस्व मे ।
यद् भुक्त्वामृतमाहर्तुं समर्थः स्यामहं प्रभो ॥ १२ ॥
क्षुत्पिपासाविघातार्थं भक्ष्यमाख्यातु मे भवान् ।
अतः भगवन्! आप मेरे लिये कोई दूसरा भोजन बताइये। प्रभो! वह भोजन ऐसा हो जिसे खाकर मैं अमृत लानेमें समर्थ हो सकूँ। मेरी भूख-प्यासको मिटा देनेके लिये आप पर्याप्त भोजन बताइये ॥ १२ १/२ ॥