भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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जिसे देवता भी नहीं कर सकते थे, गरुडका ऐसा अलौकिक कर्म देखकर वे महर्षि आश्चर्यसे चकित हो उठे। उनके हृदयमें कम्प छा गया और उन्होंने उस महान् पक्षीका नाम इस प्रकार रखा (उनके गरुड नामकी व्युत्पत्ति इस प्रकार की)— ।। ६ ।।

गुरुं भारं समासाद्योड्डीन एष विहंगमः । गरुडस्तु खगश्रेष्ठस्तस्मात् पन्नगभोजनः ।। ७ ।।

ये आकाशमें विचरनेवाले सर्पभोजी पक्षिराज भारी भार लेकर उड़े हैं; इसलिये (‘गुरुम् आदाय उड्डीन इति गरुडः’ इस व्युत्पत्तिके अनुसार) ये गरुड कहलायेंगे ।। ७ ।।

ततः शनैः पर्यपतत् पक्षैः शैलान् प्रकम्पयन् । एवं सोऽभ्यपतद् देशान् बहून् सगजकच्छपः ।। ८ ।।

तदनन्तर गरुड अपने पंखोंकी हवासे बड़े-बड़े पर्वतोंको कम्पित करते हुए धीरे-धीरे उड़ने लगे। इस प्रकार वे हाथी और कछुएको साथ लिये हुए ही अनेक देशोंमें उड़ते फिरे ।। ८ ।।

दयार्थं वालखिल्यानां न च स्थानमविन्दत । स गत्वा पर्वतश्रेष्ठं गन्धमादनमज्जसा ।। ९ ।।

वालखिल्य ऋषियोंके ऊपर दयाभाव होनेके कारण ही वे कहीं बैठ न सके और उड़ते-उड़ते अनायास ही पर्वतश्रेष्ठ गन्धमादनपर जा पहुँचे ।। ९ ।।

ददर्श कश्यपं तत्र पितरं तपसि स्थितम् । ददर्श तं पिता चापि दिव्यरूपं विहंगमम् ।। १० ।। तेजोवीर्यबलोपेतं मनोमारुतरंहसम् । शैलशृङ्गप्रतीकाशं ब्रह्मदण्डमिवोद्यतम् ।। ११ ।।

वहाँ उन्होंने तपस्यामें लगे हुए अपने पिता कश्यपजीको देखा। पिताने भी अपने पुत्रको देखा। पक्षिराजका स्वरूप दिव्य था। वे तेज, पराक्रम और बलसे सम्पन्न तथा मन और वायुके समान वेगशाली थे। उन्हें देखकर पर्वतके शिखरका भान होता था। वे उठे हुए ब्रह्मदण्डके समान जान पड़ते थे ।। १०-११ ।।

अचिन्त्यमनभिध्येयं सर्वभूतभयंकरम् । महावीर्यधरं रौद्रं साक्षादग्निमिवोद्यतम् ।। १२ ।।

उनका स्वरूप ऐसा था, जो चिन्तन और ध्यानमें नहीं आ सकता था। वे समस्त प्राणियोंके लिये भय उत्पन्न कर रहे थे। उन्होंने अपने भीतर महान् पराक्रम धारण कर रखा था। वे बहुत भयंकर प्रतीत होते थे। जान पड़ता था, उनके रूपमें स्वयं अग्निदेव प्रकट हो गये हैं ।। १२ ।।

अप्रधृष्यमजेयं च देवदानवराक्षसैः । भेत्तारं गिरिशृङ्गाणां समुद्रजलशोषणम् ।। १३ ।।