महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंततस्तेष्वपयातेषु पितरं विनतासुतः । शाखाव्याक्षिप्तवदनः पर्यपृच्छत कश्यपम् ॥ १९ ॥ उनके चले जानेपर विनतानन्दन गरुडने, जो मुँहमें शाखा लिये रहनेके कारण कठिनाईसे बोल पाते थे, अपने पिता कश्यपजीसे पूछा- ॥ १९ ॥ भगवन् क्व विमुञ्चामि तरोः शाखामिमामहम् । वर्जितं मानुषैर्देशमाख्यातु भगवान् मम ॥ २० ॥ ‘भगवन्! इस वृक्षकी शाखाको मैं कहाँ छोड़ दूँ? आप मुझे ऐसा कोई स्थान बतावें जहाँ बहुत दूरतक मनुष्य न रहते हों’ ॥ २० ॥ ततो निःपुरुषं शैलं हिमसंरुद्धकन्दरम् । अगम्यं मनसाप्यन्यैस्तस्याचख्यौ स कश्यपः ॥ २१ ॥ तब कश्यपजीने उन्हें एक ऐसा पर्वत बता दिया, जो सर्वथा निर्जन था। जिसकी कन्दराएँ बर्फसे ढँकी हुई थीं और जहाँ दूसरा कोई मनसे भी नहीं पहुँच सकता था ॥ २१ ॥ तं पर्वतं महाकुक्षिमुद्दिश्य स महाखगः । जवेनाभ्यपतत् तार्क्ष्यः सशाखागजकच्छपः ॥ २२ ॥ उस बड़े पेटवाले पर्वतका पता पाकर महान् पक्षी गरुड उसीको लक्ष्य करके शाखा, हाथी और कछुए सहित बड़े वेगसे उड़े ॥ २२ ॥ न तां वध्री परिणहेच्छतचर्मा महातनुम् । शाखिनो महतीं शाखां यां प्रगृह्य ययौ खगः ॥ २३ ॥ गरुड वटवृक्षकी जिस विशाल शाखाको चोंचमें लेकर जा रहे थे, वह इतनी मोटी थी कि सौ पशुओंके चमड़ोंसे बनायी हुई रस्सी भी उसे लपेट नहीं सकती थी ॥ २३ ॥ स ततः शतसाहस्रं योजनान्तरमागतः । कालेन नातिमहता गरुडः पतगेश्वरः ॥ २४ ॥ पक्षिराज गरुड उसे लेकर थोड़ी ही देरमें वहाँसे एक लाख योजन दूर चले आये ॥ २४ ॥ स तं गत्वा क्षणेनैव पर्वतं वचनात् पितुः । अमुञ्चन्महतीं शाखां सस्वनं तत्र खेचरः ॥ २५ ॥ पिताके आदेशसे क्षणभरमें उस पर्वतपर पहुँचकर उन्होंने वह विशाल शाखा वहीं छोड़ दी। गिरते समय उससे बड़ा भारी शब्द हुआ ॥ २५ ॥ पक्षानिलहतश्चास्य प्राकम्पत स शैलराट् । मुमोच पुष्पवर्षं च समागलितपादपः ॥ २६ ॥ वह पर्वतराज उनके पंखोंकी वायुसे आहत होकर काँप उठा। उसपर उगे हुए बहुतेरे वृक्ष गिर पड़े और वह फूलोंकी वर्षा-सी करने लगा ॥ २६ ॥