महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअनहोनी बात नहीं हुई थी। उस समय वज्रकी गड़गड़ाहटके साथ बड़े जोरकी आँधी उठने लगी। हजारों उल्काएँ गिरने लगीं ॥ ३३—३५ ॥ निरभ्रमेव चाकाशं प्रजगर्ज महास्वनम् । देवानांमपि यो देवः सोऽप्यवर्षत शोणितम् ॥ ३६ ॥ आकाशमें बादल नहीं थे तो भी बड़ी भारी आवाजमें विकट गर्जना होने लगी। देवताओंके भी देवता पर्जन्य रक्तकी वर्षा करने लगे ॥ ३६ ॥ मम्लुर्माल्यानि देवानां नेशुस्तेजांसि चैव हि । उत्पातमेघा रौद्राश्च ववृषुः शोणितं बहु ॥ ३७ ॥ देवताओंके दिव्य पुष्पहार मुरझा गये, उनके तेज नष्ट होने लगे। उत्पातकालिक बहुत-से भयंकर मेघ प्रकट हो अधिक मात्रामें रुधिरकी वर्षा करने लगे ॥ ३७ ॥ रजांसि मुकुटान्येषामुत्थितानि व्यधर्षयन् । ततस्त्राससमुद्विग्नः सह देवैः शतक्रतुः । उत्पातान् दारुणान् पश्यन्नित्युवाच बृहस्पतिम् ॥ ३८ ॥ बहुत-सी धूलें उड़कर देवताओंके मुकुटोंको मलिन करने लगीं। ये भयंकर उत्पात देखकर देवताओं-सहित इन्द्र भयसे व्याकुल हो गये और बृहस्पतिजीसे इस प्रकार बोले ॥ ३८ ॥
इन्द्र उवाच किमर्थं भगवन् घोरा उत्पाताः सहसोत्थिताः । न च शत्रुं प्रपश्यामि युधि यो नः प्रधर्षयेत् ॥ ३९ ॥ इन्द्रने पूछा— भगवन्! सहसा ये भयंकर उत्पात क्यों होने लगे हैं? मैं ऐसा कोई शत्रु नहीं देखता, जो युद्धमें हम देवताओंका तिरस्कार कर सके ॥ ३९ ॥
बृहस्पतिरुवाच तवापराधाद् देवेन्द्र प्रमादाच्च शतक्रतो । तपसा वालखिल्यानां महर्षीणां महात्मनाम् ॥ ४० ॥ कश्यपस्य मुनेः पुत्रो विनतायाश्च खेचरः । हर्तुं सोममभिप्राप्तो बलवान् कामरूपधृक् ॥ ४१ ॥ बृहस्पतिजीने कहा— देवराज इन्द्र! तुम्हारे ही अपराध और प्रमादसे तथा महात्मा वालखिल्य महर्षियोंके तपके प्रभावसे कश्यप मुनि और विनताके पुत्र पक्षिराज गरुड अमृतका अपहरण करनेके लिये आ रहे हैं। वे बड़े बलवान् और इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ हैं ॥ ४०-४१ ॥ समर्थो बलिनां श्रेष्ठो हर्तुं सोमं विहंगमः । सर्वं सम्भावयाम्यस्मिन्नसाध्यमपि साधयेत् ॥ ४२ ॥