महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवालखिल्या ऊचुः इन्द्रार्थोऽयं समारम्भः सर्वेषां नः प्रजापते । अपत्यार्थं समारम्भो भवतश्चायमीप्सितः ॥ २२ ॥ तदिदं सफलं कर्म त्वयैव प्रतिगृह्यताम् । तथा चैवं विधत्स्वात्र यथा श्रेयोऽनुपश्यसि ॥ २३ ॥ **वालखिल्योंने कहा—**प्रजापते! हम सब लोगोंका यह अनुष्ठान इन्द्रके लिये हुआ था और आपका यह यज्ञसमारोह संतानके लिये अभीष्ट था। अतः इस फलसहित कर्मको आप ही स्वीकार करें और जिसमें सबकी भलाई दिखायी दे, वैसा ही करें ॥ २२-२३ ॥
सौतिरुवाच एतस्मिन्नेव काले तु देवी दाक्षायणी शुभा । विनता नाम कल्याणी पुत्रकामा यशस्विनी ॥ २४ ॥ तपस्तप्त्वा व्रतपरा स्नाता पुंसवने शुचिः । उपचक्राम भर्तारं तामुवाचाथ कश्यपः ॥ २५ ॥ **उग्रश्रवाजी कहते हैं—**इसी समय शुभलक्षणा दक्षकन्या कल्याणमयी विनता देवी, जो उत्तम यशसे सुशोभित थी, पुत्रकी कामनासे तपस्यापूर्वक ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करने लगी। ऋतुकाल आनेपर जब वह स्नान करके शुद्ध हुई, तब अपने स्वामीकी सेवामें गयी। उस समय कश्यपजीने उससे कहा— ॥ २४-२५ ॥ आरम्भः सफलो देवि भविता यस्त्वयेप्सितः । जनयिष्यसि पुत्रौ द्वौ वीरौ त्रिभुवनेश्वरौ ॥ २६ ॥ 'देवि! तुम्हारा यह अभीष्ट समारम्भ अवश्य सफल होगा। तुम ऐसे दो पुत्रोंको जन्म दोगी, जो बड़े वीर और तीनों लोकोंपर शासन करनेकी शक्ति रखनेवाले होंगे ॥ २६ ॥ तपसा वालखिल्यानां मम संकल्पजौ तथा । भविष्यतो महाभागौ पुत्रौ त्रैलोक्यपूजितौ ॥ २७ ॥ 'वालखिल्योंकी तपस्या तथा मेरे संकल्पसे तुम्हें दो परम सौभाग्यशाली पुत्र प्राप्त होंगे, जिनकी तीनों लोकोंमें पूजा होगी' ॥ २७ ॥ उवाच चैनां भगवान् कश्यपः पुनरेव ह । धार्यतामप्रमादेन गर्भोऽयं सुमहोदयः ॥ २८ ॥ इतना कहकर भगवान् कश्यपने पुनः विनतासे कहा—'देवि! यह गर्भ महान् अभ्युदयकारी होगा, अतः इसे सावधानीसे धारण करो ॥ २८ ॥ एतौ सर्वपतत्रीणामिन्द्रत्वं कारयिष्यतः । लोकसम्भावितौ वीरौ कामरूपौ विहंगमौ ॥ २९ ॥