भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 308

देवा ऊचुः स मुनिप्रवरो ब्रह्मञ्जरत्कारुर्महातपाः । कस्यां पुत्रं महात्मानं जनयिष्यति वीर्यवान् ॥ १४ ॥

**देवताओेंने पूछा—**ब्रह्मन्! वे मुनिशिरोमणि महातपस्वी शक्तिशाली जरत्कारु किसके गर्भसे अपने उस महात्मा पुत्रको उत्पन्न करेंगे? ॥ १४ ॥

ब्रह्मोवाच सनामायां सनामा स कन्यायां द्विजसत्तमः । अपत्यं वीर्यसम्पन्नं वीर्यवाञ्जनयिष्यति ॥ १५ ॥

**ब्रह्माजीने कहा—**वे शक्तिशाली द्विजश्रेष्ठ जिस 'जरत्कारु' नामसे प्रसिद्ध होंगे, उसी नामवाली कन्याको पत्नीरूपमें प्राप्त करके उसके गर्भसे एक शक्तिसम्पन्न पुत्र उत्पन्न करेंगे ॥ १५ ॥

वासुकेः सर्पराजस्य जरत्कारुः स्वसा किल । स तस्यां भविता पुत्रः शापान्नागांश्च मोक्ष्यति ॥ १६ ॥

सर्पराज वासुकिकी बहिनका नाम जरत्कारु है। उसीके गर्भसे वह पुत्र उत्पन्न होगा, जो नागोंको शापसे छुड़ायेगा ॥ १६ ॥

एलापत्र उवाच एवमस्त्विति तं देवाः पितामहमथाब्रुवन् । उक्त्वैवं वचनं देवान् विरिञ्चिस्त्रिदिवं ययौ ॥ १७ ॥

**एलापत्र कहते हैं—**यह सुनकर देवता ब्रह्माजीसे कहने लगे—'एवमस्तु' (ऐसा ही हो)। देवताओंसे ये सब बातें बताकर ब्रह्माजी ब्रह्मलोकमें चले गये ॥ १७ ॥

सोऽहमेवं प्रपश्यामि वासुके भगिनीं तव । जरत्कारुरिति ख्यातां तां तस्मै प्रतिपादय ॥ १८ ॥ भैक्षवद् भिक्षमाणाय नागानां भयशान्तये । ऋषये सुव्रतायैनामेष मोक्षः श्रुतो मया ॥ १९ ॥

अतः नागराज वासुके! मैं तो ऐसा समझता हूँ कि आप नागोंका भय दूर करनेके लिये कन्याकी भिक्षा माँगनेवाले, उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षि जरत्कारुको अपनी जरत्कारु नामवाली यह बहिन ही भिक्षारूपमें अर्पित कर दें। उस शापसे छूटनेका यही उपाय मैंने सुना है ॥ १८-१९ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि एलापत्रवाक्ये अष्टत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥