महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइतिहासके स्वरूपका विचार करके ज्ञानदृष्टिद्वारा आदिसे अन्ततक सब कुछ प्रत्यक्षकी भाँति देखा (और इस ग्रन्थका निर्माण किया)।
निष्प्रभेऽस्मिन् निरालोके सर्वतस्तमसावृते । बृहदण्डमभूदेकं प्रजानां बीजमव्ययम् ॥ २९ ॥ सृष्टिके प्रारम्भमें जब यहाँ वस्तुविशेष या नामरूप आदिका भान नहीं होता था, प्रकाशका कहीं नाम नहीं था, सर्वत्र अन्धकार-ही-अन्धकार छा रहा था, उस समय एक बहुत बड़ा अण्ड प्रकट हुआ, जो सम्पूर्ण प्रजाओंका अविनाशी बीज था ॥ २९ ॥
युगस्यादौ निमित्तं तन्महद्दिव्यं प्रचक्षते । यस्मिन् संश्रूयते सत्यं ज्योतिर्ब्रह्म सनातनम् ॥ ३० ॥ ब्रह्मकल्पके आदिमें उसी महान् एवं दिव्य अण्डको चार प्रकारके प्राणिसमुदायका कारण कहा जाता है। जिसमें सत्यस्वरूप ज्योतिर्मय सनातन ब्रह्म अन्तर्यामीरूपसे प्रविष्ट हुआ है, ऐसा श्रुति वर्णन करती है३। ॥ ३० ॥
अद्भुतं चाप्यचिन्त्यं च सर्वत्र समतां गतम् । अव्यक्तं कारणं सूक्ष्मं यत्तत् सदसदात्मकम् ॥ ३१ ॥ वह ब्रह्म अद्भुत, अचिन्त्य, सर्वत्र समानरूपसे व्याप्त, अव्यक्त, सूक्ष्म, कारणस्वरूप एवं अनिर्वचनीय है और जो कुछ सत्-असत्रूपमें उपलब्ध होता है, सब वही है ॥ ३१ ॥
यस्मात् पितामहो जज्ञे प्रभुरेकः प्रजापतिः । ब्रह्मा सुरगुरुः स्थाणुर्मनुः कः परमेष्ठ्यथ ॥ ३२ ॥ प्राचेतसस्तथा दक्षो दक्षपुत्राश्च सप्त वै । ततः प्रजानां पतयः प्राभवन्नेकविंशतिः ॥ ३३ ॥ उस अण्डसे ही प्रथम देहधारी, प्रजापालक प्रभु, देवगुरु पितामह ब्रह्मा तथा रुद्र, मनु, प्रजापति, परमेष्ठी, प्रचेताओेंके पुत्र, दक्ष तथा दक्षके सात पुत्र (क्रोध, तम, दम, विक्रीत, अंगिरा, कर्दम और अश्व) प्रकट हुए। तत्पश्चात् इक्कीस प्रजापति (मरीचि आदि सात ऋषि और चौदह मनु)३ पैदा हुए ॥ ३२-३३ ॥
पुरुषश्चाप्रमेयात्मा यं सर्व ऋषयो विदुः । विश्वेदेवास्तथादित्या वसवोऽथाश्विनावपि ॥ ३४ ॥ जिन्हें मत्स्य-कूर्म आदि अवतारोंके रूपमें सभी ऋषि-मुनि जानते हैं, वे अप्रमेयात्मा विष्णुरूप पुरुष और उनकी विभूतिरूप विश्वेदेव, आदित्य, वसु एवं अश्विनीकुमार आदि भी क्रमशः प्रकट हुए हैं ॥ ३४ ॥
यक्षाः साध्याः पिशाचाश्च गुह्यकाः पितरस्तथा । ततः प्रसूता विद्वांसः शिष्टा ब्रह्मर्षिसत्तमाः ॥ ३५ ॥