भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 334, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 334

तापसैरुपनीतानि फलानि सहिता मया । ततो राजा ससचिवः फलान्यादातुमैच्छत ॥ २९ ॥ तदनन्तर उन्हें पारितोषिक देने आदिका कार्य करके कहा—'अब आपलोग जायें।' तपस्वियोंके वेषमें छिपे हुए उन नागोंके चले जानेपर राजाने अपने मन्त्रियों और सुहृदोंसे कहा—'ये सब तपस्वियोंद्वारा लाये हुए बड़े स्वादिष्ठ फल हैं। इन्हें मेरे साथ आपलोग भी खायँ।' ऐसा कहकर मन्त्रियोंसहित राजाने उन फलोंको लेनेकी इच्छा की ॥ २७—२९ ॥

विधिना सम्प्रयुक्तो वै ऋषिवाक्येन तेन तु । यस्मिन्नेव फले नागस्तमेवाभक्षयत् स्वयम् ॥ ३० ॥ विधाताके विधान एवं महर्षिके वचनसे प्रेरित होकर राजाने वही फल स्वयं खाया, जिसपर तक्षक नाग बैठा था ॥ ३० ॥

ततो भक्षयतस्तस्य फलात् कृमिरभूदणुः । ह्रस्वकः कृष्णनयनस्ताम्रवर्णोऽथ शौनक ॥ ३१ ॥ शौनकजी! खाते समय राजाके हाथमें जो फल था, उससे एक छोटा-सा कीट प्रकट हुआ। देखनेमें वह अत्यन्त लघु था, उसकी आँखें काली और शरीरका रंग ताँबेके समान था ॥ ३१ ॥

स तं गृह्य नृपश्रेष्ठः सचिवानिदमब्रवीत् । अस्तमभ्येति सविता विषादद्य न मे भयम् ॥ ३२ ॥ नृपश्रेष्ठ परीक्षित्ने उस कीड़ेको हाथमें लेकर मन्त्रियोंसे इस प्रकार कहा—'अब सूर्यदेव अस्ताचलको जा रहे हैं; इसलिये इस समय मुझे सर्पके विषसे कोई भय नहीं है ॥ ३२ ॥

सत्यवागस्तु स मुनिः कृमिर्मां दशतामयम् । तक्षको नाम भूत्वा वै तथा परिहृतं भवेत् ॥ ३३ ॥ 'वे मुनि सत्यवादी हों, इसके लिये यह कीट ही तक्षक नाम धारण करके मुझे डँस ले। ऐसा करनेसे मेरे दोषका परिहार हो जायगा ॥ ३३ ॥

ते चैनमन्ववर्तन्त मन्त्रिणः कालचोदिताः । एवमुक्त्वा स राजेन्द्रो ग्रीवायां संनिवेश्य ह ॥ ३४ ॥ कृमिकं प्राहसत् तूर्णं मुमूर्षुर्नष्टचेतनः । प्रहसन्नेव भोगेन तक्षकेण त्ववेष्ट्यत ॥ ३५ ॥ तस्मात् फलाद् विनिष्क्रम्य यत् तद् राज्ञे निवेदितम् । वेष्टयित्वा च वेगेन विनद्य च महास्वनम् । अदशत् पृथिवीपालं तक्षकः पन्नगेश्वरः ॥ ३६ ॥ कालसे प्रेरित होकर मन्त्रियोंने भी उनकी हाँ-में-हाँ मिला दी। मन्त्रियोंसे पूर्वोक्त बात कहकर राजाधिराज परीक्षित् उस लघु कीटको कंधेपर रखकर जोर-जोरसे हँसने लगे। वे

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