भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 340

‘खशके इस गुच्छेमें जो मूलका एक तन्तु यहाँ बचा है, उसे भी यह चूहा अपने तीखे दाँतोंसे धीरे-धीरे कुतर रहा है ॥ ७ ॥ च्छेत्स्यतेऽल्पावशिष्टत्वादेतदप्यचिरादिव । ततस्तु पतितारोऽत्र गर्ते व्यक्तमधोमुखाः ॥ ८ ॥ ‘उसका स्वल्प भाग शेष है, वह भी बात-की-बातमें कट जायगा। फिर तो आपलोग नीचे मुँह किये निश्चय ही इस गड्ढेमें गिर जायँगे ॥ ८ ॥ तस्य मे दुःखमुत्पन्नं दृष्ट्वा युष्मानधोमुखान् । कृच्छ्रामापदमापन्नान् प्रियं किं करवाणि वः ॥ ९ ॥ तपसोऽस्य चतुर्थेन तृतीयेनाथवा पुनः । अर्धेन वापि निस्तीर्तुमापदं ब्रूत मा चिरम् ॥ १० ॥ ‘आपको इस प्रकार नीचे मुँह किये लटकते देख मेरे मनमें बड़ा दुःख हो रहा है। आपलोग बड़ी कठिन विपत्तिमें पड़े हैं। मैं आपलोगोंका कौन प्रिय कार्य करूँ? आपलोग मेरी इस तपस्याके चौथे, तीसरे अथवा आधे भागके द्वारा भी इस विपत्तिसे बचाये जा सकें तो शीघ्र बतलावें ॥ ९-१० ॥ अथवापि समग्रेण तरन्तु तपसा मम । भवन्तः सर्व एवेह काममेवं विधीयताम् ॥ ११ ॥ ‘अथवा मेरी सारी तपस्याके द्वारा भी यदि आप सभी लोग यहाँ इस संकटसे पार हो सकें तो भले ही ऐसा कर लें’ ॥ ११ ॥

पितर ऊचुः वृद्धो भवान् ब्रह्मचारी यो नस्त्रातुमिहेच्छसि । न तु विप्राग्र्य तपसा शक्यते तद् व्यपोहितुम् ॥ १२ ॥ पितरोंने कहा—विप्रवर! आप बूढ़े ब्रह्मचारी हैं, जो यहाँ हमारी रक्षा करना चाहते हैं; किंतु हमारा संकट तपस्यासे नहीं टाला जा सकता ॥ १२ ॥ अस्ति नस्तात तपसः फलं प्रवदतां वर । संतानप्रक्षयाद् ब्रह्मन् पताम निरयेऽशुचौ ॥ १३ ॥ तात! तपस्याका बल तो हमारे पास भी है। वक्ताओंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण! हम तो वंशपरम्पराका विच्छेद होनेके कारण अपवित्र नरकमें गिर रहे हैं ॥ १३ ॥ संतानं हि परो धर्म एवमाह पितामहः । लम्बतामिह नस्तात न ज्ञानं प्रतिभाति वै ॥ १४ ॥ ब्रह्माजीका वचन है कि संतान ही सबसे उत्कृष्ट धर्म है। तात! यहाँ लटकते हुए हमलोगोंकी सुध-बुध प्रायः खो गयी है, हमें कुछ ज्ञात नहीं होता ॥ १४ ॥ येन त्वा नाभिजानीमो लोके विख्यातपौरुषम् ।