महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस त्वरण्यगतः प्राज्ञः पितॄणां हितकाम्यया । उवाच कन्यां याचामि तिस्रो वाचः शनैरिमाः ॥ १३ ॥ वनमें जानेपर विद्वान् जरत्कारुने पितरोंके हितकी कामनासे तीन बार धीरे-धीरे यह बात कही—'मैं कन्या माँगता हूँ' ॥ १३ ॥ यानि भूतानि सन्तीह स्थावराणि चराणि च । अन्तर्हितानि वा यानि तानि शृण्वन्तु मे वचः ॥ १४ ॥ (फिर जोरसे बोले—) 'यहाँ जो स्थावर-जंगम, दृश्य या अदृश्य प्राणी हैं, वे सब मेरी बात सुनें— ॥ १४ ॥ उग्रे तपसि वर्तन्ते पितरश्चोदयन्ति माम् । निविशस्वेति दुःखार्ताः संतानस्य चिकीर्षया ॥ १५ ॥ 'मेरे पितर भयंकर कष्टमें पड़े हैं और दुःखसे आतुर हो संतान-प्राप्तिकी इच्छा रखकर मुझे प्रेरित कर रहे हैं कि 'तुम विवाह कर लो' ॥ १५ ॥ निवेशायाखिलां भूमिं कन्याभैक्ष्यं चरामि भोः । दरिद्रो दुःखशीलश्च पितृभिः संनियोजितः ॥ १६ ॥ 'अतः विवाहके लिये मैं सारी पृथ्वीपर घूमकर कन्याकी भिक्षा चाहता हूँ। यद्यपि मैं दरिद्र हूँ और सुविधाओंके अभावमें दुःखी हूँ, तो भी पितरोंकी आज्ञासे विवाहके लिये उद्यत हूँ ॥ १६ ॥ यस्य कन्यास्ति भूतस्य ये मयेह प्रकीर्तिताः । ते मे कन्यां प्रयच्छन्तु चरतः सर्वतोदिशम् ॥ १७ ॥ 'मैंने यहाँ जिनका नाम लेकर पुकारा है, उनमेंसे जिस किसी भी प्राणीके पास विवाहके योग्य विख्यात गुणोंवाली कन्या हो, वह सब दिशाओंमें विचरनेवाले मुझ ब्राह्मणको अपनी कन्या दे ॥ १७ ॥ मम कन्या सनाम्नी या भैक्ष्यवच्चोदिता भवेत् । भरेयं चैव यां नाहं तां मे कन्यां प्रयच्छत ॥ १८ ॥ 'जो कन्या मेरे ही जैसे नामवाली हो, भिक्षाकी भाँति मुझे दी जा सकती हो और जिसके भरण-पोषणका भार मुझपर न हो, ऐसी कन्या कोई मुझे दे' ॥ १८ ॥ ततस्ते पन्नगा ये वै जरत्कारौ समाहिताः । तामादाय प्रवृत्तिं ते वासुकेः प्रत्यवेदयन् ॥ १९ ॥ तब उन नागोंने जो जरत्कारु मुनिकी खोजमें लगाये गये थे, उनका यह समाचार पाकर उन्होंने नागराज वासुकिको सूचित किया ॥ १९ ॥ तेषां श्रुत्वा स नागेन्द्रस्तां कन्यां समलंकृताम् । प्रगृह्यारण्यमगमत् समीपं तस्य पन्नगः ॥ २० ॥