भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 349

वहाँ मन्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ तपोवृद्ध महाव्रती धर्मात्मा जरत्कारुने शास्त्रीय विधि और मन्त्रोच्चारणके साथ नागकन्याका पाणिग्रहण किया ॥ ५ ॥

ततो वासगृहं रम्यं पन्नगेन्द्रस्य सम्मतम् । जगाम भार्यामादाय स्तूयमानो महर्षिभिः ॥ ६ ॥ तदनन्तर महर्षियोंसे प्रशंसित होते हुए वे नागराजके रमणीय भवनमें, जो मनके अनुकूल था, अपनी पत्नीको लेकर गये ॥ ६ ॥

शयनं तत्र संक्लृप्तं स्पर्ध्यास्तरणसंवृतम् । तत्र भार्यासहायो वै जरत्कारुरुवास ह ॥ ७ ॥ वहाँ बहुमूल्य बिछौनोंसे सजी हुई शय्या बिछी थी। जरत्कारु मुनि अपनी पत्नीके साथ उसी भवनमें रहने लगे ॥ ७ ॥

स तत्र समयं चक्रे भार्यया सह सत्तमः । विप्रियं मे न कर्तव्यं न च वाच्यं कदाचन ॥ ८ ॥ उन साधुशिरोमणिने वहाँ अपनी पत्नीके सामने यह शर्त रखी—'तुम्हें ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिये, जो मुझे अप्रिय लगे। साथ ही कभी अप्रिय वचन भी नहीं बोलना चाहिये ॥ ८ ॥

त्यजेयं विप्रिये च त्वां कृते वासं च ते गृहे । एतद् गृहाण वचनं मया यत् समुदीरितम् ॥ ९ ॥ 'तुमसे अप्रिय कार्य हो जानेपर मैं तुम्हें और तुम्हारे घरमें रहना छोड़ दूँगा। मैंने जो कुछ कहा है, मेरे इस वचनको दृढ़तापूर्वक धारण कर लो' ॥ ९ ॥

ततः परमसंविग्ना स्वसा नागपतेस्तदा । अतिदुःखान्विता वाक्यं तमुवाचैवमस्त्विति ॥ १० ॥ यह सुनकर नागराजकी बहिन अत्यन्त उद्विग्न हो गयी और उस समय बहुत दुःखी होकर बोली—'भगवन्! ऐसा ही होगा' ॥ १० ॥

तथैव सा च भर्तारं दुःखशीलमुपाचरत् । उपायैः श्वेतकाकीयैः प्रियकामा यशस्विनी ॥ ११ ॥ फिर वह यशस्विनी नागकन्या दुःखद स्वभाववाले पतिकी उसी शर्तके अनुसार सेवा करने लगी। वह श्वेतकाकीय* उपायोंसे सदा पतिका प्रिय करनेकी इच्छा रखकर निरन्तर उनकी आराधनामें लगी रहती थी ॥ ११ ॥

ऋतुकाले ततः स्नाता कदाचिद् वासुकेः स्वसा । भर्तारं वै यथान्यायमुपतस्थे महामुनिम् ॥ १२ ॥ तदनन्तर किसी समय ऋतुकाल आनेपर वासुकिकी बहिन स्नान करके न्यायपूर्वक अपने पति महामुनि जरत्कारुकी सेवामें उपस्थित हुई ॥ १२ ॥

तत्र तस्याः समभवद् गर्भो ज्वलनसंनिभः ।