महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनास्मिन् कुले जातु बभूव राजा यो न प्रजानां प्रियकृत् प्रियश्च । विशेषतः प्रेक्ष्य पितामहानां वृत्तं महद्वृत्तपरायणानाम् ॥ १९ ॥ जनमेजयने पूछा— मन्त्रियो! हमारे इस कुलमें कभी कोई ऐसा राजा नहीं हुआ, जो प्रजाका प्रिय करनेवाला तथा सब लोगोंका प्रेमपात्र न रहा हो। विशेषतः महापुरुषोंके आचारमें प्रवृत्त रहनेवाले हमारे प्रपितामह पाण्डवोंके सदाचारको देखकर प्रायः सभी धर्मपरायण ही होंगे ॥ १९ ॥
कथं निधनमापन्नः पिता मम तथाविधः । आचक्षध्वं यथावन्मे श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ २० ॥ अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि मेरे वैसे धर्मात्मा पिताकी मृत्यु किस प्रकार हुई? आपलोग मुझसे इसका यथावत् वर्णन करें। मैं इस विषयमें सब बातें ठीक-ठीक सुनना चाहता हूँ ॥ २० ॥
सौतिरुवाच एवं संचोदिता राज्ञा मन्त्रिणस्ते नराधिपम् । ऊचुः सर्वे यथावृत्तं राज्ञः प्रियहितैषिणः ॥ २१ ॥ उग्रश्रवाजी कहते हैं— शौनक! राजा जनमेजयके इस प्रकार पूछनेपर उन मन्त्रियोंने महाराजसे सब वृत्तान्त ठीक-ठीक बताया; क्योंकि वे सभी राजाका प्रिय चाहनेवाले और हितैषी थे ॥ २१ ॥
मन्त्रिण ऊचुः स राजा पृथिवीपालः सर्वशस्त्रभृतां वरः । बभूव मृगयाशीलस्तव राजन् पिता सदा ॥ २२ ॥ यथा पाण्डुर्महाबाहुर्धनुर्धरवरो युधि । अस्मास्वासज्य सर्वाणि राजकार्याण्यशेषतः ॥ २३ ॥ स कदाचिद् वनगतो मृगं विव्याध पत्रिणा । विद्ध्वा चान्वसरत् तूर्णं तं मृगं गहने वने ॥ २४ ॥ मन्त्री बोले— राजन्! समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ तुम्हारे पिता भूपाल परीक्षित्का सदा महाबाहु पाण्डुकी भाँति हिंसक पशुओंको मारनेका स्वभाव था और युद्धमें वे उन्हींकी भाँति सम्पूर्ण धनुर्धर वीरोंमें श्रेष्ठ सिद्ध होते थे। एक दिनकी बात है, वे सम्पूर्ण राजकार्यका भार हमलोगोंपर रखकर वनमें शिकार खेलनेके लिये गये। वहाँ उन्होंने पंखयुक्त बाणसे एक हिंसक पशुको बींध डाला। बींधकर तुरंत ही गहन वनमें उसका पीछा किया ॥ २२—२४ ॥