महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 365, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंमुनिश्रेष्ठ तपस्वी, जितेन्द्रिय, विशुद्धात्मा, कर्मनिष्ठ, अद्भुत शक्तिशाली, तपस्याद्वारा कान्तिमान् शरीरवाले, अपने अंगोंको संयममें रखनेवाले, सदाचारी, शुभवक्ता, निश्चल भावसे स्थित, लोभरहित, क्षुद्रताशून्य (गम्भीर), दोषदृष्टिसे रहित, वृद्ध, मौनव्रतावलम्बी तथा सम्पूर्ण प्राणियोंको आश्रय देनेवाले थे, तो भी आपके पिता परीक्षित्ने उनका तिरस्कार किया।। ३-७।।
शशापाथ महातेजाः पितरं ते रुषान्वितः।
ऋषेः पुत्रो महातेजा बालोऽपि स्थविरद्युतिः।। ८।।
यह सब जानकर वह बाल्यावस्थामें भी वृद्धोंका-सा तेज धारण करनेवाला महातेजस्वी ऋषिकुमार क्रोधसे आगबबूला हो उठा और उसने तुम्हारे पिताको शाप दे दिया।। ८।।
स क्षिप्रमुदकं स्पृष्ट्वा रोषादिदमुवाच ह।
पितरं तेऽभिसंधाय तेजसा प्रज्वलन्निव।। ९।।
अनागसि गुरौ यो मे मृतं सर्पमवासृजत्।
तं नागस्तक्षकः क्रुद्धस्तेजसा प्रधक्ष्यति।। १०।।
आशीविषस्तिग्मतेजा मद्वाक्यबलचोदितः।
सप्तरात्रादितः पापं पश्य मे तपसो बलम्।। ११।।
शृंगी तेजसे प्रज्वलित-सा हो रहा था। उसने शीघ्र ही हाथमें जल लेकर तुम्हारे पिताको लक्ष्य करके रोषपूर्वक यह बात कही—'जिसने मेरे निरपराध पितापर मरा साँप डाल दिया है, उस पापीको आजसे सात रातके बाद मेरी वाक्शक्तिसे प्रेरित प्रचण्ड तेजस्वी विषधर तक्षक नाग कुपित हो अपनी विषाग्निसे जला देगा। देखो, मेरी तपस्याका बल'।। ९—११।।
इत्युक्त्वा प्रययौ तत्र पिता यत्रास्य सोऽभवत्।
दृष्ट्वा च पितरं तस्मै तं शापं प्रत्यवेदयत्।। १२।।
ऐसा कहकर वह बालक उस स्थानपर गया, जहाँ उसके पिता बैठे थे। पिताको देखकर उसने राजाको शाप देनेकी बात बतायी।। १२।।
स चापि मुनिशार्दूलः प्रेषयामास ते पितुः।
शिष्यं गौरमुखं नाम शीलवन्तं गुणान्वितम्।। १३।।
आचख्यौ स च विश्रान्तो राज्ञः सर्वमशेषतः।
शप्तोऽसि मम पुत्रेण यत्तो भव महीपते।। १४।।
तब मुनिश्रेष्ठ शमीकने तुम्हारे पिताके पास अपने शिष्य गौरमुखको भेजा, जो सुशील और गुणवान् था। उसने विश्राम कर लेनेपर राजासे सब बातें बतायीं और महर्षिका संदेश इस प्रकार सुनाया—'भूपाल! मेरे पुत्रने तुम्हें शाप दे दिया है; अतः सावधान हो जाओ।। १३-१४।।
तक्षकस्त्वां महाराज तेजसासौ दहिष्यति।