महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 378, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंसदस्यश्चाभवद् व्यासः पुत्रशिष्यसहायवान् । उद्दालकः प्रमतकः श्वेतकेतुश्च पिङ्गलः ॥ ७ ॥ असितो देवलश्चैव नारदः पर्वतस्तथा । आत्रेयः कुण्डजठरौ द्विजः कालघटस्तथा ॥ ८ ॥ वात्स्यः श्रुतश्रवा वृद्धो जपस्वाध्यायशीलवान् । कोहलो देवशर्मा च मौद्गल्यः समसौरभः ॥ ९ ॥ एते चान्ये च बहवो ब्राह्मणा वेदपारगाः । सदस्याश्चाभवंस्तत्र सत्रे पारीक्षितस्य ह ॥ १० ॥
इसी प्रकार पुत्र और शिष्योंसहित भगवान् वेदव्यास, उद्दालक, प्रमतक, श्वेतकेतु, पिंगल, असित, देवल, नारद, पर्वत, आत्रेय, कुण्ड, जठर, द्विजश्रेष्ठ कालघट, वात्स्य, जप और स्वाध्यायमें लगे रहनेवाले बूढ़े श्रुतश्रवा, कोहल, देवशर्मा, मौद्गल्य तथा समसौरभ—ये और अन्य बहुत-से वेदविद्याके पारंगत ब्राह्मण जनमेजयके उस सर्पयज्ञमें सदस्य बने थे ॥ ७–१० ॥
जुह्वत्स्वृत्विक्ष्वथ तदा सर्पसत्रे महाक्रतौ । अहयः प्रापतंस्तत्र घोराः प्राणिभयावहाः ॥ ११ ॥
उस समय उस महान् यज्ञ सर्पसत्रमें ज्यों-ज्यों ऋत्विज् लोग आहुतियाँ डालते, त्यों-त्यों प्राणिमात्रको भय देनेवाले घोर सर्प वहाँ आ-आकर गिरते थे ॥ ११ ॥
वसामेदोवहाः कुल्या नागानां सम्प्रवर्तिताः । ववौ गन्धश्च तुमलो दह्यतामनिशं तदा ॥ १२ ॥
नागोंकी चर्बी और मेदसे भरे हुए कितने ही नाले बह चले। निरन्तर जलनेवाले सर्पोंकी तीखी दुर्गन्ध चारों ओर फैल रही थी ॥ १२ ॥
पततां चैव नागानां धिष्ठितानां तथाम्बरे । अश्रूयतानिशं शब्दः पच्यतां चाग्निना भृशम् ॥ १३ ॥
जो आगमें पड़ रहे थे, जो आकाशमें ठहरे हुए थे और जो जलती हुई आगकी ज्वालामें पक रहे थे, उन सभी सर्पोंका करुण क्रन्दन निरन्तर जोर-जोरसे सुनायी पड़ता था ॥ १३ ॥
तक्षकस्तु स नागेन्द्रः पुरन्दरनिवेशनम् । गतः श्रुत्वैव राजानं दीक्षितं जनमेजयम् ॥ १४ ॥
नागराज तक्षकने जब सुना कि राजा जनमेजयने सर्पयज्ञकी दीक्षा ली है, तब उसे सुनते ही वह देवराज इन्द्रके भवनमें चला गया ॥ १४ ॥
ततः सर्वं यथावृत्तमाख्याय भुजगोत्तमः । अगच्छच्छरणं भीत आगः कृत्वा पुरन्दरम् ॥ १५ ॥