महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकालाग्निके समान दाहक और अत्यन्त भयंकर शापका यहाँ मैं अवश्य नाश कर डालूँगा। अतः आप उससे किसी तरह भय न करें ।। २५ ।।
सौतिरुवाच
ततः स वासुकेर्घोरमपनीय मनोज्वरम् । आधाय चात्मनोऽङ्गेषु जगाम त्वरितो भृशम् ।। २६ ।। जनमेजयस्य तं यज्ञं सर्वैः समुदितं गुणैः । मोक्षाय भुजगेन्द्राणामास्तीको द्विजसत्तमः ।। २७ ।। **उग्रश्रवाजी कहते हैं—**तदनन्तर नागराज वासुकिके भयंकर चिन्ता-ज्वरको दूर कर और उसे अपने ऊपर लेकर द्विजश्रेष्ठ आस्तीक बड़ी उतावलीके साथ नागराज वासुकि आदिको प्राण-संकटसे छुड़ानेके लिये राजा जनमेजयके उस सर्पयज्ञमें गये, जो समस्त उत्तम गुणोंसे सम्पन्न था ।। २६-२७ ।।
स गत्वापश्यदास्तीको यज्ञायतनमुत्तमम् । वृतं सदस्यैर्बहुभिः सूर्यवह्निसमप्रभैः ।। २८ ।। वहाँ पहुँचकर आस्तीकने परम उत्तम यज्ञमण्डप देखा, जो सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी अनेक सदस्योंसे भरा हुआ था ।। २८ ।।
स तत्र वारितो द्वाःस्थैः प्रविशन् द्विजसत्तमः । अभितुष्टाव तं यज्ञं प्रवेशार्थी परंतपः ।। २९ ।। द्विजश्रेष्ठ आस्तीक जब यज्ञमण्डपमें प्रवेश करने लगे, उस समय द्वारपालोंने उन्हें रोक दिया। तब काम-क्रोध आदि शत्रुओंको संतप्त करनेवाले आस्तीक उसमें प्रवेश करनेकी इच्छा रखकर उस यज्ञकी स्तुति करने लगे ।। २९ ।।
स प्राप्य यज्ञायतनं वरिष्ठं द्विजोत्तमः पुण्यकृतां वरिष्ठः । तुष्टाव राजानमनन्तकीर्ति- मृत्विक्सदस्यांश्च तथैव चाग्निम् ।। ३० ।। इस प्रकार उस परम उत्तम यज्ञमण्डपके निकट पहुँचकर पुण्यवानोंमें श्रेष्ठ विप्रवर आस्तीकने अक्षय कीर्तिसे सुशोभित यजमान राजा जनमेजय, ऋत्विजों, सदस्यों तथा अग्निदेवका स्तवन आरम्भ किया ।। ३० ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सर्पसत्रे आस्तीकागमने चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ५४ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें सर्पसत्रमें आस्तीकका आगमनविषयक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५४ ।।