भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 402, कुल 2256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 402

प्राधान्येन बहुत्वात् तु न सर्वे परिकीर्तिताः ।

एतेषां प्रसवो यश्च प्रसवस्य च संततिः ॥ २० ॥

न शक्यं परिसंख्यातुं ये दीप्तं पावकं गताः ।

त्रिशीर्षाः सप्तशीर्षाश्च दशशीर्षास्तथापरे ॥ २१ ॥

ब्रह्मन्! अब धृतराष्ट्रके कुलमें उत्पन्न नागोंके नामोंका मुझसे यथावत् वर्णन सुनो। वे

वायुके समान वेगशाली और अत्यन्त विषैले थे। (उनके नाम इस प्रकार हैं—) शंकुकर्ण,

पिठरक, कुठार, मुखसेचक, पूर्णांगद, पूर्णमुख, प्रहास, शकुनि, दरि, अमाहठ, कामठक,

सुषेण, मानस, अव्यय, भैरव, मुण्डवेदांग, पिशंग, उद्रपारक, ऋषभ, वेगवान् नाग,

पिण्डारक, महाहनु, रक्तांग, सर्वसारंग, समृद्ध, पटवासक, वराहक, वीरणक, सुचित्र,

चित्रवेगिक, पराशर, तरुणक, मणि, स्कन्ध और आरुणि—(ये सभी धृतराष्ट्रवंशी नाग

सर्पसत्रकी आगमें जलकर भस्म हो गये थे।) ब्रह्मन्! इस प्रकार मैंने अपने कुलकी कीर्ति

बढ़ानेवाले मुख्य-मुख्य नागोंका वर्णन किया है। उनकी संख्या बहुत है, इसलिये सबका

नामोल्लेख नहीं किया गया है। इन सबकी संतानोंकी और संतानोंकी संततिकी, जो

प्रज्वलित अग्निमें जल मरी थीं, गणना नहीं की जा सकती। किसीके तीन सिर थे तो

किसीके सात तथा कितने ही दस-दस सिरवाले नाग थे ॥ १४—२१ ॥

कालानलविषा घोरा हुताः शतसहस्रशः ।

महाकाया महावेगाः शैलशृङ्गसमुच्छ्रयाः ॥ २२ ॥

उनके विष प्रलयाग्निके समान दाहक थे। वे नाग बड़े ही भयंकर थे। उनके शरीर

विशाल और वेग महान् थे। वे ऊँचे तो ऐसे थे, मानो पर्वतके शिखर हों। ऐसे नाग लाखोंकी

संख्यामें यज्ञाग्निकी आहुति बन गये ॥ २२ ॥

योजनायामविस्तारा द्वियोजनसमायताः ।

कामरूपाः कामबला दीप्तानलविषोल्बणाः ॥ २३ ॥

दग्धास्तत्र महासत्रे ब्रह्मदण्डनिपीडिताः ॥ २४ ॥

उनकी लम्बाई-चौड़ाई एक-एक, दो-दो योजनतककी थी। वे इच्छानुसार रूप धारण

करनेवाले तथा इच्छानुरूप बल-पराक्रमसे सम्पन्न थे। वे सब-के-सब धधकती हुई आगके

समान भयंकर विषसे भरे थे। माताके शापरूपी ब्रह्मदण्डसे पीड़ित होनेके कारण वे उस

महासत्रमें जलकर भस्म हो गये ॥ २३-२४ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सर्पनामकथने

सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें सर्पनामकथनविषयक

सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५७ ॥