भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 410

महाभारतमाख्यानं पाण्डवानां यशस्करम् ।
जनमेजयेन पृष्टः सन् कृष्णद्वैपायनस्तदा ॥ ६ ॥
श्रावयामास विधिवत् तदा कर्मान्तरे तु सः ।
तामहं विधिवत् पुण्यां श्रोतुमिच्छामि वै कथाम् ॥ ७ ॥
**शौनकजी बोले—**सूतनन्दन! महाभारत नामक इतिहास तो पाण्डवोंके यशका विस्तार करनेवाला है। सर्पयज्ञके विभिन्न कर्मोंके बीचमें अवकाश मिलने-पर जब राजा जनमेजय प्रश्न करते, तब श्रीकृष्ण-द्वैपायन व्यासजी उन्हें विधिपूर्वक महाभारतकी कथा सुनाते थे। मैं उसी पुण्यमयी कथाको विधिपूर्वक सुनना चाहता हूँ ॥ ६-७ ॥
मनःसागरसम्भूतां महर्षेर्भावितात्मनः ।
कथयस्व सतां श्रेष्ठ सर्वरत्नमयीमिमाम् ॥ ८ ॥
यह कथा पवित्र अन्तःकरणवाले महर्षि वेद-व्यासके हृदयरूपी समुद्रसे प्रकट हुए सब प्रकारके शुभ विचाररूपी रत्नोंसे परिपूर्ण है। साधुशिरोमणे! आप इस कथाको मुझे सुनाइये ॥ ८ ॥

सौतिरुवाच
हन्त ते कथयिष्यामि महदाख्यानमुत्तमम् ।
कृष्णद्वैपायनमतं महाभारतमादितः ॥ ९ ॥
**उग्रश्रवाजीने कहा—**शौनक! मैं बड़ी प्रसन्नताके साथ महाभारत नामक उत्तम उपाख्यानका आरम्भसे ही वर्णन करूँगा, जो श्रीकृष्णद्वैपायन वेदव्यासको अभिमत है ॥ ९ ॥
शृणु सर्वमशेषेण कथ्यमानं मया द्विज ।
शंसितुं तन्महान् हर्षो ममापीह प्रवर्तते ॥ १० ॥
विप्रवर! मेरे द्वारा कही जानेवाली इस सम्पूर्ण महाभारत-कथाको आप पूर्णरूपसे सुनिये। यह कथा सुनाते समय मुझे भी महान् हर्ष प्राप्त होता है ॥ १० ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि अंशावतरणपर्वणि कथानुबन्धे
एकोनषष्टितमोऽध्यायः ॥ ५९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अंशावतरणपर्वमें कथानुबन्धविषयक उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५९ ॥