महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजनमेजयस्य राजर्षेः स महात्मा सदस्तदा । विवेश सहितः शिष्यैर्वेदवेदाङ्गपारगैः ॥ ७ ॥ उन महात्मा व्यासने वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान् शिष्योंके साथ उस समय राजर्षि जनमेजयके यज्ञमण्डपमें प्रवेश किया ॥ ७ ॥ तत्र राजानमासीनं ददर्श जनमेजयम् । वृतं सदस्यैर्बहुभिर्देवैरिव पुरन्दरम् ॥ ८ ॥ वहाँ पहुँचकर उन्होंने सिंहासनपर बैठे हुए राजा जनमेजयको देखा, जो बहुत-से सभासदोंद्वारा इस प्रकार घिरे हुए थे, मानो देवराज इन्द्र देवताओंसे घिरे हुए हों ॥ ८ ॥ तथा मूर्धाभिषिक्तैश्च नानाजनपदेश्वरैः । ऋत्विग्भिर्ब्रह्मकल्पैश्च कुशलैर्यज्ञसंस्तरे ॥ ९ ॥ जिनके मस्तकोंपर अभिषेक किया गया था, ऐसे अनेक जनपदोंके नरेश तथा यज्ञानुष्ठानमें कुशल ब्रह्माजीके समान योग्यतावाले ऋत्विज् भी उन्हें सब ओरसे घेरे हुए थे ॥ ९ ॥ जनमेजयस्तु राजर्षिर्दृष्ट्वा तमृषिमागतम् । सगणोऽभ्युद्ययौ तूर्णं प्रीत्या भरतसत्तमः ॥ १० ॥ भरतश्रेष्ठ राजर्षि जनमेजय महर्षि व्यासको आया देख बड़ी प्रसन्नताके साथ उठकर खड़े हो गये और अपने सेवकगणोंके साथ तुरंत ही उनकी अगवानी करनेके लिये चल दिये ॥ १० ॥ काञ्चनं विष्टरं तस्मै सदस्यानुमतः प्रभुः । आसनं कल्पयामास यथा शक्रो बृहस्पतेः ॥ ११ ॥ जैसे इन्द्र बृहस्पतिजीको आसन देते हैं, उसी प्रकार राजाने सदस्योंकी अनुमति लेकर व्यासजीके लिये सुवर्णका विष्टर दे आसनकी व्यवस्था की ॥ ११ ॥ तत्रोपविष्टं वरदं देवर्षिगणपूजितम् । पूजयामास राजेन्द्रः शास्त्रदृष्टेन कर्मणा ॥ १२ ॥ देवर्षियोंद्वारा पूजित वरदायक व्यासजी जब वहाँ बैठ गये, तब राजेन्द्र जनमेजयने शास्त्रीय विधिके अनुसार उनका पूजन किया ॥ १२ ॥ पाद्यमाचमनीयं च अर्घ्यं गां च विधानतः । पितामहाय कृष्णाय तदर्हाय न्यवेदयत् ॥ १३ ॥ उन्होंने अपने पितामह श्रीकृष्णद्वैपायनको विधि-विधानके साथ पाद्य, आचमनीय, अर्घ्य और गौ भेंट की, जो इन वस्तुओंको पानेके अधिकारी थे ॥ १३ ॥ प्रतिगृह्य तु तां पूजां पाण्डवाज्जनमेजयात् । गां चैव समनुज्ञाप्य व्यासः प्रीतोऽभवत् तदा ॥ १४ ॥