महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 418, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंआदमियों)-से पाण्डवोंने एक सुरंग खुदवायी। तत्पश्चात् वे शत्रुसंतापी पाण्डव उस लाक्षागृहमें आग लगा पुरोचनको दग्ध करके भयसे व्याकुल हो मातासहित सुरंगद्वारा वहाँसे निकल भागे ॥ २०—२३ ॥
ददृशुर्दारुणं रक्षो हिडिम्बं वननिर्झरे ।
हत्वा च तं राक्षसेन्द्रं भीताः समवबोधनात् ॥ २४ ॥
निशि सम्प्राद्रवन् पार्था धार्तराष्ट्रभयार्दिताः ।
प्राप्ता हिडिम्बा भीमेन यत्र जातो घटोत्कचः ॥ २५ ॥
तत्पश्चात् वनमें एक झरनेके पास उन्होंने एक भयंकर राक्षसको देखा, जिसका नाम हिडिम्ब था। राक्षसराज हिडिम्बको मारकर पाण्डवलोग प्रकट होनेके भयसे रातमें ही वहाँसे दूर निकल गये। उस समय उन्हें धृतराष्ट्रके पुत्रोंका भय सता रहा था। हिडिम्ब-वधके पश्चात् भीमको हिडिम्बा नामकी राक्षसी पत्नीरूपमें प्राप्त हुई, जिसके गर्भसे घटोत्कचका जन्म हुआ ॥ २४-२५ ॥
एकचक्रां ततो गत्वा पाण्डवाः संशितव्रताः ।
वेदाध्ययनसम्पन्नास्तेऽभवन् ब्रह्मचारिणः ॥ २६ ॥
तदनन्तर कठोर व्रतका पालन करनेवाले पाण्डव एकचक्रा नगरीमें जाकर वेदाध्ययनपरायण ब्रह्मचारी बन गये ॥ २६ ॥
ते तत्र नियताः कालं कंचिदूषुर्नरर्षभाः ।
मात्रा सहैकचक्रायां ब्राह्मणस्य निवेशने ॥ २७ ॥
उस एकचक्रा नगरीमें वे नरश्रेष्ठ पाण्डव अपनी माताके साथ एक ब्राह्मणके घरमें कुछ कालतक टिके रहे ॥ २७ ॥
तत्राससाद क्षुधितं पुरुषादं वृकोदरः ।
भीमसेनो महाबाहुर्बकं नाम महाबलम् ॥ २८ ॥
उस नगरके समीप एक मनुष्यभक्षी राक्षस रहता था, जिसका नाम था बक। एक दिन महाबाहु भीमसेन उस क्षुधातुर महाबली राक्षस बकके समीप गये ॥ २८ ॥
तं चापि पुरुषव्याघ्रो बाहुवीर्येण पाण्डवः ।
निहत्य तरसा वीरो नगरान् पर्यसान्त्वयत् ॥ २९ ॥
नरश्रेष्ठ पाण्डुनन्दन वीरवर भीमने अपने बाहुबलसे उस राक्षसको वेगपूर्वक मारकर वहाँके नगरनिवासियोंको धैर्य बँधाया ॥ २९ ॥
ततस्ते शुश्रुवुः कृष्णां पञ्चालेषु स्वयंवराम् ।
श्रुत्वा चैवाभ्यगच्छन्त गत्वा चैवालभन्त ताम् ॥ ३० ॥
ते तत्र द्रौपदीं लब्ध्वा परिसंवत्सरोषिताः ।
विदिता हास्तिनपुरं प्रत्याजग्मुररिंदमाः ॥ ३१ ॥