महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 438, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंमन्मथाभिपरीतात्मा नापश्यद् गिरिकां तदा । अपश्यन् कामसंतप्तश्चरमाणो यदृच्छया ॥ ४६ ॥ यह उद्दीपन-सामग्री पाकर राजाका हृदय कामवेदनासे पीड़ित हो उठा। उस समय उन्हें अपनी रानी गिरिकाका दर्शन नहीं हुआ। उसे न देखकर कामाग्निसे संतप्त हो वे इच्छानुसार इधर-उधर घूमने लगे ॥ ४६ ॥ पुष्पसंछन्नशाखाग्रं पल्लवैरुपशोभितम् । अशोकं स्तबकैश्छन्नं रमणीयमपश्यत ॥ ४७ ॥ घूमते-घूमते उन्होंने एक रमणीय अशोकका वृक्ष देखा, जो पल्लवोंसे सुशोभित और पुष्पके गुच्छोंसे आच्छादित था। उसकी शाखाओंके अग्रभाग फूलोंसे ढके हुए थे ॥ ४७ ॥ अधस्तात् तस्य छायायां सुखासीनो नराधिपः । मधुगन्धैश्च संयुक्तं पुष्पगन्धमनोहरम् ॥ ४८ ॥ राजा उसी वृक्षके नीचे उसकी छायामें सुखपूर्वक बैठ गये। वह वृक्ष मकरन्द और सुगन्धसे भरा था। फूलोंकी गन्धसे वह बरबस मनको मोह लेता था ॥ ४८ ॥ वायुना प्रेर्यमाणस्तु धूम्नाय मुदमन्वगात् । तस्य रेतः प्रचस्कन्द चरतो गहने वने ॥ ४९ ॥ उस समय कामोद्दीपक वायुसे प्रेरित हो राजाके मनमें रतिके लिये स्त्रीविषयक प्रीति उत्पन्न हुई। इस प्रकार वनमें विचरनेवाले राजा उपरिचरका वीर्य स्खलित हो गया ॥ ४९ ॥ स्कन्नमात्रं च तद् रेतो वृक्षपत्रेण भूमिपः । प्रतिजग्राह मिथ्या मे न पतेद् रेत इत्युत ॥ ५० ॥ उसके स्खलित होते ही राजाने यह सोचकर कि मेरा वीर्य व्यर्थ न जाय, उसे वृक्षके पत्तेपर उठा लिया ॥ ५० ॥ इदं मिथ्या परिस्कन्नं रेतो मे न भवेदिति । ऋतुश्च तस्याः पत्न्या मे न मोघः स्यादिति प्रभुः ॥ ५१ ॥ संचिन्त्यैवं तदा राजा विचार्य च पुनः पुनः । अमोघत्वं च विज्ञाय रेतसो राजसत्तमः ॥ ५२ ॥ उन्होंने विचार किया, 'मेरा यह स्खलित वीर्य व्यर्थ न हो, साथ ही मेरी पत्नी गिरिकाका ऋतुकाल भी व्यर्थ न जाय' इस प्रकार बारम्बार विचारकर राजाओंमें श्रेष्ठ वसुने उस वीर्यको अमोघ बनानेका ही निश्चय किया ॥ ५१-५२ ॥ शुक्रप्रस्थापने कालं महिष्याः प्रसमीक्ष्य वै । अभिमन्त्र्याथ तच्छुक्रमारात् तिष्ठन्तमाशुगम् ॥ ५३ ॥ सूक्ष्मधर्मार्थतत्त्वज्ञो गत्वा श्येनं ततोऽब्रवीत् । मत्प्रियार्थमिदं सौम्य शुक्रं मम गृहं नय ॥ ५४ ॥ गिरिकायाः प्रयच्छाशु तस्या ह्यार्तवमद्य वै ।