भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 443

इस प्रकार महर्षि पराशरद्वारा सत्यवतीके गर्भसे द्वैपायन व्यासजीका जन्म हुआ। वे बाल्यावस्थामें ही यमुनाके द्वीपमें छोड़ दिये गये, इसलिये 'द्वैपायन' नामसे प्रसिद्ध हुए॥ ८६॥ (ततः सत्यवती हृष्टा जगाम स्वं निवेशनम्। तस्यास्त्वायोजनाद् गन्धमाजिघ्रन्ति नरा भुवि॥ दाशराजस्तु तद्गन्धमाजिघ्रन् प्रीतिमावहत्।) तदनन्तर सत्यवती प्रसन्नतापूर्वक अपने घरपर गयी। उस दिनसे भूमण्डलके मनुष्य एक योजन दूरसे ही उसकी दिव्य गन्धका अनुभव करने लगे। उसका पिता दाशराज भी उसकी गन्ध सूँघकर बहुत प्रसन्न हुआ।

दाश उवाच (त्वामाहुर्मत्स्यगन्धेति कथं बाले सुगन्धता। अपास्य मत्स्यगन्धत्वं केन दत्ता सुगन्धता॥) **दाशराजने पूछा—**बेटी! तेरे शरीरसे मछलीकी-सी दुर्गन्ध आनेके कारण लोग तुझे 'मत्स्यगन्धा' कहा करते थे, फिर तुझमें यह सुगन्ध कहाँसे आ गयी? किसने यह मछलीकी दुर्गन्ध दूर कर तेरे शरीरको सुगन्ध प्रदान की है?

सत्यवत्युवाच (शक्तेः पुत्रो महाप्राज्ञः पराशर इति स्मृतः॥ नावं वाह्यमानाया मम दृष्ट्वा सुगर्हितम्। अपास्य मत्स्यगन्धत्वं योजनाद् गन्धतां ददौ॥ ऋषेः प्रसादं दृष्ट्वा तु जनाः प्रीतिमुपागमन्।) **सत्यवती बोली—**पिताजी! महर्षि शक्तिके पुत्र महाज्ञानी पराशर हैं, (वे यमुनाजीके तटपर आये थे; उस समय) मैं नाव खे रही थी। उन्होंने मेरी दुर्गन्धताकी ओर लक्ष्य करके मुझपर कृपा की और मेरे शरीरसे मछलीकी गन्ध दूर करके ऐसी सुगन्ध दे दी, जो एक योजन दूरतक अपना प्रभाव रखती है। महर्षिका यह कृपाप्रसाद देखकर सब लोग बड़े प्रसन्न हुए।

पादापसारिणं धर्मं स तु विद्वान् युगे युगे। आयुः शक्तिं च मर्त्यानां युगावस्थामवेक्ष्य च॥ ८७॥ ब्रह्मणो ब्राह्मणानां च तथानुग्रहकाङ्क्षया। विव्यास वेदान् यस्मात् स तस्माद् व्यास इति स्मृतः॥ ८८॥ विद्वान् द्वैपायनजीने देखा कि प्रत्येक युगमें धर्मका एक-एक पाद लुप्त होता जा रहा है। मनुष्योंकी आयु और शक्ति क्षीण हो चली है और युगकी ऐसी दुरवस्था हो गयी है। यह