महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबभूव राजा धर्मात्मा सर्वभूतहिते रतः॥ ५५॥ राजन्! कालेयोंमें जो आठवाँ था, वह बृहत् नामसे प्रसिद्ध सर्वभूतहितकारी धर्मात्मा राजा हुआ॥ ५५॥ कुक्षिस्तु राजन् विख्यातो दानवानां महाबलः। पार्वतीय इति ख्यातः काञ्चनाचलसंनिभः॥ ५६॥ महाराज! दानवोंमें कुक्षि नामसे प्रसिद्ध जो महाबली राजा था, वह पार्वतीय नामक राजा हुआ; जो मेरुगिरिके समान तेजस्वी एवं विशाल था॥ ५६॥ क्रथनश्च महावीर्यः श्रीमान् राजा महासुरः। सूर्याक्ष इति विख्यातः क्षितौ जज्ञे महीपतिः॥ ५७॥ महापराक्रमी क्रथन नामक जो श्रीसम्पन्न महान् असुर था, वह भूमण्डलमें पृथ्वीपति राजा सूर्याक्ष नामसे उत्पन्न हुआ॥ ५७॥ असुराणां तु यः सूर्यः श्रीमांश्चैव महासुरः। दरदो नाम बाह्लीको वरः सर्वमहीक्षिताम्॥ ५८॥ असुरोंमें जो सूर्य नामक श्रीसम्पन्न महान् असुर था, वही पृथ्वीपर सब राजाओंमें श्रेष्ठ दरद नामक बाह्लीकराज हुआ॥ ५८॥ गणः क्रोधवशो नाम यस्ते राजन् प्रकीर्तितः। ततः संजज्ञिरे वीराः क्षिताविह नराधिपाः॥ ५९॥ राजन्! क्रोधवश नामक जिन असुरगणोंका तुम्हें परिचय दिया है, उन्हींमेंसे कुछ लोग इस पृथ्वीपर निम्नांकित वीर राजाओंके रूपमें उत्पन्न हुए॥ ५९॥ मद्रकः कर्णवेष्टश्च सिद्धार्थः कीटकस्तथा। सुवीरश्च सुबाहुश्च महावीरोऽथ बाह्लिकः॥ ६०॥ क्रथो विचित्रः सुरथः श्रीमान् नीलश्च भूमिपः। चीरवासाश्च कौरव्य भूमिपालश्च नामतः॥ ६१॥ दन्तवक्त्रश्च नामासीद् दुर्जयश्चैव दानवः। रुक्मी च नृपशार्दूलो राजा च जनमेजयः॥ ६२॥ आषाढो वायुवेगश्च भूरितेजास्तथैव च। एकलव्यः सुमित्रश्च वाटधानोऽथ गोमुखः॥ ६३॥ कारूषकाश्च राजानः क्षेमधूर्तिस्तथैव च। श्रुतायुरुद्दहश्चैव बृहत्सेनस्तथैव च॥ ६४॥ क्षेमोग्रतीर्थः कुहरः कलिङ्गेषु नराधिपः। मतिमांश्च मनुष्येन्द्र ईश्वरश्चेति विश्रुतः॥ ६५॥ मद्रक, कर्णवेष्ट, सिद्धार्थ, कीटक, सुवीर, सुबाहु, महावीर, बाह्लिक, क्रथ, विचित्र, सुरथ, श्रीमान् नील नरेश, चीरवासा, भूमिपाल, दन्तवक्त्र, दानव दुर्जय, नृपश्रेष्ठ रुक्मी,