महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइनके नामोंका जो क्रम दिया गया है, उसीके अनुसार विद्वान् पुरुष इन्हें जेठा और छोटा समझते हैं। धृतराष्ट्रके सभी पुत्र उत्कृष्ट रथी, शूरवीर और युद्धकी कलामें कुशल थे ॥ १०७ ॥ सर्वे वेदविदश्चैव राजच्छास्त्रे च पारगाः । सर्वे संग्रामविद्यासु विद्याभिजनशोभिनः ॥ १०८ ॥ राजन्! वे सब-के-सब वेदवेत्ता, शास्त्रोंके पारंगत विद्वान्, संग्राम-विद्यामें प्रवीण तथा उत्तम विद्या और उत्तम कुलसे सुशोभित थे ॥ १०८ ॥ सर्वेषामनुरूपाश्च कृता दारा महीपते । दुःशलां समये राजन् सिन्धुराजाय कौरवः ॥ १०९ ॥ जयद्रथाय प्रददौ सौबलानुमते तदा । धर्मस्यांशं तु राजानं विद्धि राजन् युधिष्ठिरम् ॥ ११० ॥ भूपाल! उन सबका सुयोग्य स्त्रियोंके साथ विवाह हुआ था। महाराज! कुरुराज दुर्योधनने समय आनेपर शकुनिकी सलाहसे अपनी बहिन दुःशलाका विवाह सिन्धुदेशके राजा जयद्रथके साथ कर दिया। जनमेजय! राजा युधिष्ठिरको तो तुम धर्मका अंश जानो ॥ १०९-११० ॥ भीमसेनं तु वातस्य देवराजस्य चार्जुनम् । अश्विनोस्तु तथैवांशौ रूपेणाप्रतिमौ भुवि ॥ १११ ॥ नकुलः सहदेवश्च सर्वभूतमनोहरौ । यस्तु वर्चा इति ख्यातः सोमपुत्रः प्रतापवान् ॥ ११२ ॥ सोऽभिमन्युर्बृहत्कीर्तिरर्जुनस्य सुतोऽभवत् । यस्यावतरणे राजन् सुरान् सोमोऽब्रवीदिदम् ॥ ११३ ॥ भीमसेनको वायुका और अर्जुनको देवराज इन्द्रका अंश जानो। रूप-सौन्दर्यकी दृष्टिसे इस पृथ्वीपर जिनकी समानता करनेवाला कोई नहीं था, वे समस्त प्राणियोंका मन मोह लेनेवाले नकुल और सहदेव अश्विनीकुमारोंके अंशसे उत्पन्न हुए थे। वर्चा नामसे विख्यात जो चन्द्रमाका प्रतापी पुत्र था, वही महायशस्वी अर्जुनकुमार अभिमन्यु हुआ। जनमेजय! उसके अवतार-कालमें चन्द्रमाने देवताओंसे इस प्रकार कहा— ॥ १११—११३ ॥ नाहं दद्यां प्रियं पुत्रं मम प्राणैर्गरीयसम् । समयः क्रियतामेष न शक्यमतिवर्तितुम् ॥ ११४ ॥ ‘मेरा पुत्र मुझे अपने प्राणोंसे भी अधिक प्रिय है, अतः मैं इसे अधिक दिनोंके लिये नहीं दे सकता। इसलिये मृत्युलोकमें इसके रहनेकी कोई अवधि निश्चित कर दी जाय। फिर उस अवधिका उल्लंघन नहीं किया जा सकता ॥ ११४ ॥ सुरकार्यं हि नः कार्यमसुराणां क्षितौ वधः । तत्र यास्यत्ययं वर्चा न च स्थास्यति वै चिरम् ॥ ११५ ॥