भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 514

राजा दुष्यन्तको देखते ही मधुर वाणीमें उनके प्रति सम्मानका भाव प्रदर्शित करते हुए शीघ्रतापूर्वक स्पष्ट शब्दोंमें कहा—'अतिथिदेव! आपका स्वागत है' ॥ ४ ॥ आसनेनार्चयित्वा च पाद्येनार्घ्येण चैव हि । पप्रच्छानामयं राजन् कुशलं च नराधिपम् ॥ ५ ॥ महाराज! फिर आसन, पाद्य और अर्घ्य अर्पण करके उनका समादर करनेके पश्चात् उसने राजासे पूछा—'आपका शरीर नीरोग है न? घरपर कुशल तो है?' ॥ ५ ॥ यथावदर्चयित्वाथ पृष्ट्वा चानामयं तदा । उवाच स्मयमानेव किं कार्यं क्रियतामिति ॥ ६ ॥ उस समय विधिपूर्वक आदर-सत्कार करके आरोग्य और कुशल पूछकर वह तपस्विनी कन्या मुसकराती हुई-सी बोली—'कहिये आपकी क्या सेवा की जाय?' ॥ ६ ॥ ( आश्रमस्याभिगमने किं त्वं कार्यं चिकीर्षसि । कस्त्वमद्येह सम्प्राप्तो महर्षेराश्रमं शुभम् ॥ ) 'आपके आश्रमकी ओर पधारनेका क्या कारण है? आप यहाँ कौन-सा कार्य सिद्ध करना चाहते हैं? आपका परिचय क्या है? आप कौन हैं? और आज यहाँ महर्षिके इस शुभ आश्रमपर (किस उद्देश्यसे) आये हैं?' तामब्रवीत् ततो राजा कन्यां मधुरभाषिणीम् । दृष्ट्वा चैवानवद्याङ्गीं यथावत् प्रतिपूजितः ॥ ७ ॥ उसके द्वारा विधिवत् किये हुए आतिथ्य सत्कारको ग्रहण करके राजाने उस सर्वाङ्गसुन्दरी एवं मधुरभाषिणी कन्याकी ओर देखकर कहा ॥ ७ ॥

(दुष्यन्त उवाच राजर्षेरस्मि पुत्रोऽहमिलिलस्य महात्मनः । दुष्यन्त इति मे नाम सत्यं पुष्करलोचने ॥) आगतोऽहं महाभागमृषिं कण्वमुपासितुम् । क्व गतो भगवान् भद्रे तन्ममाचक्ष्व शोभने ॥ ८ ॥ **दुष्यन्त बोले—**कमललोचने! मैं राजर्षि महात्मा इलिल* का पुत्र हूँ और मेरा नाम दुष्यन्त है। मैं यह सत्य कहता हूँ। भद्रे! मैं परम भाग्यशाली महर्षि कण्वकी उपासना करने—उनके सत्संगका लाभ लेनेके लिये आया हूँ। शोभने! बताओ तो, भगवान् कण्व कहाँ गये हैं? ॥ ८ ॥

शकुन्तलोवाच गतः पिता मे भगवान् फलान्याहर्तुमाश्रमात् । मुहूर्तं सम्प्रतीक्षस्व द्रष्टास्येनमुपागतम् ॥ ९ ॥