भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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उपास्यमानान् सगणेर्जातसख्यान् तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥) यदाश्रौषं त्रिदिवस्थं धनञ्जयं शक्रात् साक्षाद् दिव्यमस्त्रं यथावत् । अधीयानं शंसितं सत्यसन्धं तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १६३ ॥ जब मैंने सुना कि वनवासमें भी कुन्तीपुत्रोंके पास पुरातन महर्षिगण पधारते और उनसे मिलते हैं। उनके साथ उठते-बैठते और निवास करते हैं तथा सेवक-सम्बन्धियोंसहित पाण्डवोंके प्रति उनका मैत्रीभाव हो गया है। संजय! तभीसे मुझे अपने पक्षकी विजयका विश्वास नहीं रह गया था। जब मैंने सुना कि सत्यसंध धनंजय अर्जुन स्वर्गमें गये हुए हैं और वहाँ साक्षात् इन्द्रसे दिव्य अस्त्र-शस्त्रकी विधिपूर्वक शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं और वहाँ उनके पौरुष एवं ब्रह्मचर्य आदिकी प्रशंसा हो रही है, संजय! तभीसे मेरी युद्धमें विजयकी आशा जाती रही ॥ १६३ ॥ यदाश्रौषं कालकेयास्ततस्ते पौलोमानो वरदानाच्च दृप्ताः । देवैरजेया निर्जिताश्चार्जुनैन तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १६४ ॥ जबसे मैंने सुना कि वरदानके प्रभावसे घमंडके नशेमें चूर कालकेय तथा पौलोम नामके असुरोंको, जिन्हें बड़े-बड़े देवता भी नहीं जीत सकते थे, अर्जुनने बात-की-बातमें पराजित कर दिया, तभीसे संजय! मैंने विजयकी आशा कभी नहीं की ॥ १६४ ॥ यदाश्रौषमसुराणां वधार्थे किरीटिनं यान्तममित्रकर्शनम् । कृतार्थं चाप्यागतं शक्रलोकात् तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १६५ ॥ मैंने जब सुना कि शत्रुओंका संहार करनेवाले किरीटी अर्जुन असुरोंका वध करनेके लिये गये थे और इन्द्रलोकसे अपना काम पूरा करके लौट आये हैं, संजय! तभी मैंने समझ लिया—अब मेरी जीतकी कोई आशा नहीं ॥ १६५ ॥ (यदाश्रौषं तीर्थयात्राप्रवृत्तं पाण्डोः सुतं सहितं लोमशेन । तस्मादश्रौषीदर्जुनस्यार्थलाभं तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥) यदाश्रौषं वैश्रवणेन सार्धं समागतं भीममन्यांश्च पार्थान् ।