महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 535, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुःसप्ततितमोऽध्यायः
शकुन्तलाके पुत्रका जन्म, उसकी अद्भुत शक्ति, पुत्रसहित शकुन्तलाका दुष्यन्तके यहाँ जाना, दुष्यन्त-शकुन्तला-संवाद, आकाशवाणीद्वारा शकुन्तलाकी शुद्धिका समर्थन और भरतका राज्याभिषेक
वैशम्पायन उवाच
प्रतिज्ञाय तु दुष्यन्ते प्रतियाते शकुन्तलाम् ।
(गर्भश्च ववृधे तस्यां राजपुत्र्यां महात्मनः ।
शकुन्तला चिन्तयन्ती राजानं कार्यगौरवात् ।।
दिवारात्रमनिद्रैव स्नानभोजनवर्जिता ।।
राजप्रेषणिका विप्रांश्चतुरङ्गबलैः सह ।
अद्य श्वो वा परश्वो वा समायान्तीति निश्चिता ।।
दिवसान् पक्षानृतून् मासानयनानि च सर्वशः ।
गण्यमानेषु सर्वेषु व्यतीयुस्त्रीणि भारत ।।)
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! जब शकुन्तलासे पूर्वोक्त प्रतिज्ञा करके राजा दुष्यन्त चले गये, तब क्षत्रियकन्या शकुन्तलाके उदरमें उन महात्मा दुष्यन्तके द्वारा स्थापित किया हुआ गर्भ धीरे-धीरे बढ़ने और पुष्ट होने लगा। शकुन्तला कार्यकी गुरुतापर दृष्टि रखकर निरन्तर राजा दुष्यन्तका ही चिन्तन करती रहती थी। उसे न तो दिनमें नींद आती थी और न रातमें ही। उसका स्नान और भोजन छूट गया था। उसे यह दृढ़ विश्वास था कि राजाके भेजे हुए ब्राह्मण चतुरंगिणी सेनाके साथ आज, कल या परसोंतक मुझे लेनेके लिये अवश्य आ जायँगे। भरतनन्दन! शकुन्तलाको दिन, पक्ष, मास, ऋतु, अयन तथा वर्ष—इन सबकी गणना करते-करते तीन वर्ष बीत गये।
गर्भं सुषाव वामोरूः कुमारममितौजसम् ।। १ ।।
त्रिषु वर्षेषु पूर्णेषु दीप्तानलसमद्युतिम् ।
रूपौदार्यगुणोपेतं दौष्यन्तिं जनमेजय ।। २ ।।
जनमेजय! तदनन्तर पूरे तीन वर्ष व्यतीत होनेके बाद सुन्दर जाँघोंवाली शकुन्तलाने अपने गर्भसे प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी, रूप और उदारता आदि गुणोंसे सम्पन्न, अमित पराक्रमी कुमारको जन्म दिया, जो दुष्यन्तके वीर्यसे उत्पन्न हुआ था ।। १-२ ।।
(तस्मै तदान्तरिक्षात् तु पुष्पवृष्टिः पपात ह ।
देवदुन्दुभयो नेदुर्ननृतुश्चाप्सरोगणाः ।।