महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतयोरपत्यं कस्मात् त्वं पुंश्चलीव प्रभाषसे ॥ ७६ ॥ मेनका अप्सराओंमें श्रेष्ठ बतायी जाती है और तुम्हारे पिता विश्वामित्र भी महर्षियोंमें उत्तम समझे जाते हैं। तुम उन्हीं दोनोंकी संतान होकर व्यभिचारिणी स्त्रीके समान क्यों झूठी बातें बना रही हो ॥ ७६ ॥
अश्रद्धेयमिदं वाक्यं कथयन्ती न लज्जसे । विशेषतो मत्सकाशे दुष्टतापसि गम्यताम् ॥ ७७ ॥ तुम्हारी यह बात श्रद्धा करनेके योग्य नहीं है। इसे कहते समय तुम्हें लज्जा नहीं आती? विशेषतः मेरे समीप ऐसी बातें कहनेमें तुम्हें संकोच होना चाहिये। दुष्ट तपस्विनि! तुम चली जाओ यहाँसे ॥ ७७ ॥
क्व महर्षिः स चैवाग्र्यः साप्सराः क्व च मेनका । क्व च त्वमेवं कृपणा तापसीवेषधारिणी ॥ ७८ ॥ कहाँ वे मुनिशिरोमणि महर्षि विश्वामित्र, कहाँ अप्सराओंमें श्रेष्ठ मेनका और कहाँ तुम-जैसी तापसीका वेष धारण करनेवाली दीन-हीन नारी? ॥ ७८ ॥
अतिकायश्च ते पुत्रो बालोऽतिबलवानयम् । कथमल्पेन कालेन शालस्तम्भ इवोद्गतः ॥ ७९ ॥ तुम्हारे इस पुत्रका शरीर बहुत बड़ा है। बाल्यावस्थामें ही यह अत्यन्त बलवान् जान पड़ता है। इतने थोड़े समयमें यह साखूके खंभे-जैसा लम्बा कैसे हो गया? ॥ ७९ ॥
सुनिकृष्टा च ते योनिः पुंश्चलीव प्रभाषसे । यदृच्छया कामरागाज्जाता मेनकया ह्यसि ॥ ८० ॥ तुम्हारी जाति नीच है। तुम कुलटा-जैसी बातें करती हो। जान पड़ता है, मेनकाने अकस्मात् भोगासक्तिके वशीभूत होकर तुम्हें जन्म दिया है ॥ ८० ॥
सर्वमेतत् परोक्षं मे यत् त्वं वदसि तापसि । नाहं त्वामभिजानामि यथेष्टं गम्यतां त्वया ॥ ८१ ॥ तुम जो कुछ कहती हो, वह सब मेरी आँखोंके सामने नहीं हुआ है। तापसी! मैं तुम्हें नहीं पहचानता। तुम्हारी जहाँ इच्छा हो, वहीं चली जाओ ॥ ८१ ॥
शकुन्तलोवाच
राजन् सर्षपमात्राणि परच्छिद्राणि पश्यसि । आत्मनो बिल्वमात्राणि पश्यन्नपि न पश्यसि ॥ ८२ ॥ शकुन्तलाने कहा—राजन्! आप दूसरोंके सरसों बराबर दोषोंको तो देखते रहते हैं, किंतु अपने बेलके समान बड़े-बड़े दोषोंको देखकर भी नहीं देखते ॥ ८२ ॥
मेनका त्रिदशेष्वेव त्रिदशाश्चानु मेनकाम् । ममैवोद्रिच्यते जन्म दुष्यन्त तव जन्मनः ॥ ८३ ॥