भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 569

तब नहुषके दूसरे पुत्र सत्यपराक्रमी ययाति सम्राट् हुए। उन्होंने इस पृथ्वीका पालन तथा बहुत-से यज्ञोंका अनुष्ठान किया ॥ ३२ ॥
अतिभक्त्या पितॄनर्चन् देवांश्च प्रयत: सदा ।
अन्वगृह्णात् प्रजा: सर्वा ययातिरपराजित: ॥ ३३ ॥
तस्य पुत्रा महेष्वासा: सर्वै: समुदिता गुणै: ।
देवयांयां महाराज शर्मिष्ठायां च जज्ञिरे ॥ ३४ ॥
महाराज ययाति किसीसे परास्त होनेवाले नहीं थे। वे सदा मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर बड़े भक्ति-भावसे देवताओं तथा पितरोंका पूजन करते और समस्त प्रजापर अनुग्रह रखते थे। महाराज जनमेजय! राजा ययातिके देवयानी और शर्मिष्ठाके गर्भसे महान् धनुर्धर पुत्र उत्पन्न हुए। वे सभी समस्त सद्गुणोंके भण्डार थे ॥ ३३-३४ ॥
देवयान्यामजायेतां यदुस्तुर्वसुरेव च ।
द्रुह्युश्चानुश्च पूरुश्च शर्मिष्ठायां च जज्ञिरे ॥ ३५ ॥
यदु और तुर्वसु—ये दो देवयानीके पुत्र थे और द्रुह्यु, अनु तथा पूरु—ये तीन शर्मिष्ठाके गर्भसे उत्पन्न हुए थे ॥ ३५ ॥
स शाश्वती: समा राजन् प्रजा धर्मेण पालयन् ।
जरामाच्छन्महाघोरां नाहुषो रूपनाशिनीम् ॥ ३६ ॥
राजन्! वे सर्वदा धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करते थे। एक समय नहुषपुत्र ययातिको अत्यन्त भयानक वृद्धावस्था प्राप्त हुई, जो रूप और सौन्दर्यका नाश करनेवाली है ॥ ३६ ॥
जराभिभूत: पुत्रान् स राजा वचनमब्रवीत् ।
यदुं पूरुं तुर्वसुं च द्रुह्युं चानुं च भारत ॥ ३७ ॥
जनमेजय! वृद्धावस्थासे आक्रान्त होनेपर राजा ययातिने अपने समस्त पुत्रों यदु, पूरु, तुर्वसु, द्रुह्यु तथा अनुसे कहा— ॥ ३७ ॥
यौवनेन चरन् कामान् युवा युवतिभि: सह ।
विहर्तुमहमिच्छामि साह्यं कुरुत पुत्रका: ॥ ३८ ॥
‘पुत्रो! मैं युवावस्थासे सम्पन्न हो जवानीके द्वारा कामोपभोग करते हुए युवतियोंके साथ विहार करना चाहता हूँ। तुम मेरी सहायता करो’ ॥ ३८ ॥
तं पुत्रो दैवयानेय: पूर्वजो वाक्यमब्रवीत् ।
किं कार्यं भवत: कार्यमस्माकं यौवनेन ते ॥ ३९ ॥
यह सुनकर देवयानीके ज्येष्ठ पुत्र यदुने पूछा—‘भगवन्! हमारी जवानी लेकर उसके द्वारा आपको कौन-सा कार्य करना है’ ॥ ३९ ॥
ययातिरब्रवीत् तं वै जरा मे प्रतिगृह्यताम् ।
यौवनेन त्वदीयेन चरेयं विषयान्हम् ॥ ४० ॥