महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 629, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंहो गये ॥ २४ ॥ अनुवव्राज सम्भ्रान्तः पृष्ठतः सान्त्वयन् नृपः । न्यवर्तत न चैव स्म क्रोधसंरक्तलोचना ॥ २५ ॥ वे व्याकुल हो देवयानीको समझाते हुए उसके पीछे-पीछे गये, किंतु वह नहीं लौटी। उसकी आँखें क्रोधसे लाल हो रही थीं ॥ २५ ॥ अविब्रुवन्ती किंचित् सा राजानं साश्रुलोचना । अचिरादेव सम्प्राप्ता काव्यस्योशनसोऽन्तिकम् ॥ २६ ॥ वह राजासे कुछ न बोलकर केवल नेत्रोंसे आँसू बहाये जाती थी। कुछ ही देरमें वह कविपुत्र शुक्राचार्यके पास जा पहुँची ॥ २६ ॥ सा तु दृष्ट्वैव पितरमभिवाद्याग्रतः स्थिता । अनन्तरं ययातिस्तु पूजयामास भार्गवम् ॥ २७ ॥ पिताको देखते ही वह प्रणाम करके उनके सामने खड़ी हो गयी। तदनन्तर राजा ययातिने भी शुक्राचार्यकी वन्दना की ॥ २७ ॥
देवयान्युवाच
अधर्मेण जितो धर्मः प्रवृत्तमधरोत्तरम् । शर्मिष्ठयातिवृत्तास्मि दुहित्रा वृषपर्वणः ॥ २८ ॥ देवयानीने कहा— पिताजी! अधर्मने धर्मको जीत लिया। नीचकी उन्नति हुई और उच्चकी अवनति। वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठा मुझे लाँघकर आगे बढ़ गयी ॥ २८ ॥ त्रयोऽस्यां जनिताः पुत्रा राज्ञानेन ययातिना । दुर्भागाया मम द्वौ तु पुत्रौ तात ब्रवीमि ते ॥ २९ ॥ इन महाराज ययातिसे ही उसके तीन पुत्र हुए हैं, किंतु तात! मुझ भाग्यहीनाके दो ही पुत्र हुए हैं। यह मैं आपसे ठीक बता रही हूँ ॥ २९ ॥ धर्मज्ञ इति विख्यात एष राजा भृगूद्वह । अतिक्रान्तश्च मर्यादां काव्यैतत् कथयामि ते ॥ ३० ॥ भृगुश्रेष्ठ! ये महाराज धर्मज्ञके रूपमें प्रसिद्ध हैं; किंतु इन्होंने ही मर्यादाका उल्लंघन किया है। कविनन्दन! यह आपसे यथार्थ कह रही हूँ ॥ ३० ॥
शुक्र उवाच
धर्मज्ञः सन् महाराज योऽधर्ममकृथाः प्रियम् । तस्माज्जरा त्वामचिराद् धर्षयिष्यति दुर्जया ॥ ३१ ॥ शुक्राचार्यने कहा— महाराज! तुमने धर्मज्ञ होकर भी अधर्मको प्रिय मानकर उसका आचरण किया है। इसलिये जिसको जीतना कठिन है, वह वृद्धावस्था तुम्हें शीघ्र ही धर दबायेगी ॥ ३१ ॥