भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 637

यत् त्वं मे हृदयाज्जातो वयः स्वं न प्रयच्छसि । जरादोषस्त्वया प्रोक्तस्तस्मात् त्वं प्रतिपत्स्यसे ।। २५ ।। प्रजाश्च यौवनप्राप्ता विनशिष्यन्त्यनो तव । अग्निप्रस्कन्दनपरस्त्वं चाप्येवं भविष्यसि ।। २६ ।। ययातिने कहा—अनो! तू मेरे हृदयसे उत्पन्न होकर भी अपनी युवावस्था मुझे नहीं दे रहा है और बुढ़ापेके दोष बतला रहा है, अतः तू वृद्धावस्थाके समस्त दोषोंको प्राप्त करेगा और तेरी संतान जवान होते ही मर जायगी तथा तू भी बूढ़े-जैसा होकर अग्निहोत्रका त्याग कर देगा ।। २५-२६ ।।

ययातिरुवाच

पूरो त्वं मे प्रियः पुत्रस्त्वं वरीयान् भविष्यसि । जरा वली च मां तात पलितानि च पर्यगुः ।। २७ ।। ययातिने [पूरुसे] कहा—पूरो! तुम मेरे प्रिय पुत्र हो। गुणोंमें तुम श्रेष्ठ होओगे। तात! मुझे बुढ़ापेने घेर लिया; सब अंगोंमें झुर्रियाँ पड़ गयीं और सिरके बाल सफेद हो गये। बुढ़ापाके ये सारे चिह्न मुझे एक ही साथ प्राप्त हुए हैं ।। २७ ।। काव्यस्योशनसः शापान्न च तृप्तोऽस्मि यौवने । पूरो त्वं प्रतिपद्यस्व पाप्मानं जरया सह । कंचित् कालं चरेयं वै विषयान् वयसा तव ।। २८ ।। पूर्णे वर्षसहस्रे तु पुनर्दास्यामि यौवनम् । स्वं चैव प्रतिपत्स्यामि पाप्मानं जरया सह ।। २९ ।। कविपुत्र शुक्राचार्यके शापसे मेरी यह दशा हुई है; किंतु मैं जवानीके भोगोंसे अभी तृप्त नहीं हुआ हूँ। पूरो! तुम बुढ़ापेके साथ मेरे दोषको ले लो और मैं तुम्हारी युवावस्था लेकर उसके द्वारा कुछ कालतक विषयभोग करूँगा। एक हजार वर्ष पूरे होनेपर मैं तुम्हें पुनः तुम्हारी जवानी दे दूँगा और बुढ़ापेके साथ अपना दोष ले लूँगा ।। २८-२९ ।।

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तः प्रत्युवाच पूरुः पितरमञ्जसा । यथाऽऽत्थ मां महाराज तत् करिष्यामि ते वचः ।। ३० ।। वैशम्पायनजी कहते हैं—ययातिके ऐसा कहनेपर पूरुने अपने पितासे विनयपूर्वक कहा—'महाराज! आप मुझे जैसा आदेश दे रहे हैं, आपके उस वचनका मैं पालन करूँगा ।। ३० ।। (गुरोर्वै वचनं पुण्यं स्वर्ग्यमायुष्करं नृणाम् । गुरुप्रसादात् त्रैलोक्यमन्वशासच्छतक्रतुः ।। गुरोरनुमतिं प्राप्य सर्वान् कामानवाप्नुयात् ।)