महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपूरुने मेरी आज्ञाका पालन किया; मेरी बातको अधिक आदर दिया है, इसीने मेरा बुढ़ापा ले रखा था। अतः मेरा यह छोटा पुत्र ही वास्तवमें मेरे राज्य और धनको पानेका अधिकारी है ।। २७ ।। मम कामः स च कृतः पूरुणा मित्ररूपिणा । शुक्रेण च वरो दत्तः काव्येनोशनसा स्वयम् ।। २८ ।। पुत्रो यस्त्वानुवर्तेत स राजा पृथिवीपतिः । भवतोऽनुनयाम्येवं पूरु राज्येऽभिषिच्यताम् ।। २९ ।। पूरुने मित्ररूप होकर मेरी कामनाएँ पूर्ण की हैं। स्वयं शुक्राचार्यने मुझे वर दिया है कि ‘जो पुत्र तुम्हारा अनुसरण करे, वही राजा एवं समस्त भूमण्डलका पालक हो’। अतः मैं आपलोगोंसे विनयपूर्ण आग्रह करता हूँ कि पूरुको ही राज्यपर अभिषिक्त करें ।। २८-२९ ।।
प्रकृतय ऊचुः यः पुत्रो गुणसम्पन्नो मातापित्रोर्हितः सदा । सर्वमर्हति कल्याणं कनीयानपि सत्तमः ।। ३० ।। प्रजावर्गके लोग बोले— जो पुत्र गुणवान् और सदा माता-पिताका हितैषी हो, वह छोटा होनेपर भी श्रेष्ठतम है। वही सम्पूर्ण कल्याणका भागी होनेयोग्य है ।। ३० ।। अर्हः पूरुरिदं राज्यं यः सुतः प्रियकृत् तव । वरदानेन शुक्रस्य न शक्यं वक्तुमुत्तरम् ।। ३१ ।। पूरु आपका प्रिय करनेवाले पुत्र हैं, अतः शुक्राचार्यके वरदानके अनुसार ये ही इस राज्यको पानेके अधिकारी हैं। इस निश्चयके विरुद्ध कुछ भी उत्तर नहीं दिया जा सकता ।। ३१ ।।
वैशम्पायन उवाच पौरजानपदैस्तुष्टैरित्युक्तो नाहुषस्तदा । अभ्यषिञ्चत् ततः पूरुं राज्ये स्वे सुतमात्मनः ।। ३२ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं— नगर और राज्यके लोगोंने संतुष्ट होकर जब इस प्रकार कहा, तब नहुषनन्दन ययातिने अपने पुत्र पूरुको ही अपने राज्यपर अभिषिक्त किया ।। ३२ ।। दत्त्वा च पूरवे राज्यं वनवासाय दीक्षितः । पुरात् स निर्ययौ राजा ब्राह्मणैस्तापसैः सह ।। ३३ ।। इस प्रकार पूरुको राज्य दे वनवासकी दीक्षा लेकर राजा ययाति तपस्वी ब्राह्मणोंके साथ नगरसे बाहर निकल गये ।। ३३ ।। यदोस्तु यादवा जातास्तुर्वसोर्यवनाः स्मृताः ।