महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 645, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंषडशीतितमोऽध्यायः
वनमें राजा ययातिकी तपस्या और उन्हें स्वर्गलोककी प्राप्ति
वैशम्पायन उवाच
एवं स नाहुषो राजा ययातिः पुत्रमीप्सितम् ।
राज्येऽभिषिच्य मुदितो वानप्रस्थोऽभवन्मुनिः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! इस प्रकार नहुषनन्दन राजा ययाति अपने प्रिय पुत्र पूरुका राज्याभिषेक करके प्रसन्नतापूर्वक वानप्रस्थ मुनि हो गये ॥ १ ॥
उषित्वा च वने वासं ब्राह्मणैः संशितव्रतः ।
फलमूलाशनो दान्तस्ततः स्वर्गमितो गतः ॥ २ ॥
वे वनमें ब्राह्मणोंके साथ रहकर कठोर व्रतका पालन करते हुए फल-मूलका आहार तथा मन और इन्द्रियोंका संयम करते थे, इससे वे स्वर्गलोकमें गये ॥ २ ॥
स गतः स्वर्निवासं तं निवसन् मुदितः सुखी ।
कालेन चातिमहता पुनः शक्रेण पातितः ॥ ३ ॥
निपतन् प्रच्युतः स्वर्गादप्राप्तो मेदिनीतलम् ।
स्थित आसीदन्तरिक्षे स तदेति श्रुतं मया ॥ ४ ॥
स्वर्गलोकमें जाकर वे बड़ी प्रसन्नताके साथ सुखपूर्वक रहने लगे और बहुत कालके बाद इन्द्रद्वारा वे पुनः स्वर्गसे नीचे गिरा दिये गये। स्वर्गसे भ्रष्ट हो पृथ्वीपर गिरते समय वे भूतलतक नहीं पहुँचे, आकाशमें ही स्थिर हो गये, ऐसा मैंने सुना है ॥ ३-४ ॥
तत एव पुनश्चापि गतः स्वर्गमिति श्रुतम् ।
राज्ञा वसुमता सार्धमष्टकेन च वीर्यवान् ॥ ५ ॥
प्रतर्दनेन शिबिना समेत्य किल संसदि ।
फिर यह भी सुननेमें आया है कि वे पराक्रमी राजा ययाति मुनिसमाजमें राजा वसुमान्, अष्टक, प्रतर्दन और शिबिसे मिलकर पुनः वहींसे साधु पुरुषोंके संगके प्रभावसे स्वर्गलोकमें चले गये ॥ ५ १/२ ॥
जनमेजय उवाच
कर्मणा केन स दिवं पुनः प्राप्तो महीपतिः ॥ ६ ॥
**जनमेजयने पूछा—**मुने! किस कर्मसे वे भूपाल पुनः स्वर्गमें पहुँचे थे? ॥ ६ ॥
सर्वमेतदशेषेण श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।
कथ्यमानं त्वया विप्र विप्रर्षिगणसंनिधौ ॥ ७ ॥