महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ
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अष्टक उवाच
कस्त्वं युवा वासवtul्यरूपः स्वतेजसा दीप्यमानो यथाग्निः । पतस्युदीर्णाम्बुधरान्धकारात् खात् खेचराणां प्रवरो यथार्कः ॥ ७ ॥
अष्टकने पूछा— इन्द्रके समान सुन्दर रूपवाले तरुण पुरुष तुम कौन हो? तुम अपने तेजसे अग्निकी भाँति देदीप्यमान हो रहे हो। मेघरूपी घने अन्धकारवाले आकाशसे आकाशचारी ग्रहोंमें श्रेष्ठ सूर्यके समान तुम कैसे गिर रहे हो? ॥ ७ ॥
दृष्ट्वा च त्वां सूर्यपथात् पतन्तं वैश्वानरार्कद्युतिमप्रमेयम् । किं नु स्विदेतत् पततीति सर्वे वितर्कयन्तः परिमोहिताः स्मः ॥ ८ ॥
तुम्हारा तेज सूर्य और अग्निके सदृश है। तुम अप्रमेय शक्तिशाली जान पड़ते हो। तुम्हें सूर्यके मार्गसे गिरते देख हम सब लोग मोहित होकर इस तर्क-वितर्कमें पड़े हैं कि 'यह क्या गिर रहा है?' ॥ ८ ॥