महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 665, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंइमं भौमं नरकं ते पतन्ति लालप्यमाना नरदेव सर्वे । ते कङ्कगोमायुबलाशनार्थं* क्षीणा विवृद्धिं बहुधा व्रजन्ति ॥ ४ ॥ **ययाति बोले—**नरदेव! जो अपने मुखसे अपने पुण्य-कर्मोंका बखान करते हैं, वे सभी इस भौम नरकमें आ गिरते हैं। यहाँ वे गीधों, गीदड़ों और कौओं आदिके खानेयोग्य इस शरीरके लिये बड़ा भारी परिश्रम करके क्षीण होते और पुत्र-पौत्रादिरूपसे बहुधा विस्तारको प्राप्त होते हैं ॥ ४ ॥ तस्मादेतद् वर्जनीयं नरेन्द्र दुष्टं लोके गर्हणीयं च कर्म । आख्यातं ते पार्थिव सर्वमेव भूयश्चेदानीं वद किं ते वदामि ॥ ५ ॥ इसलिये नरेन्द्र! इस लोकमें जो दुष्ट और निन्दनीय कर्म हो उसको सर्वथा त्याग देना चाहिये। भूपाल! मैंने तुमसे सब कुछ कह दिया, बोलो, अब और तुम्हें क्या बताऊँ? ॥ ५ ॥
अष्टक उवाच
यदा तु तान् वितुदन्ते वयांसि तथा गृध्राः शितिकण्ठाः पतङ्गाः । कथं भवन्ति कथमाभवन्ति न भौममन्यं नरकं शृणोमि ॥ ६ ॥ **अष्टकने पूछा—**जब मनुष्योंको मृत्युके पश्चात् पक्षी, गीध, नीलकण्ठ और पतंग ये नोच-नोचकर खा लेते हैं, तब वे कैसे और किस रूपमें उत्पन्न होते हैं? मैंने अबतक भौम नामक किसी दूसरे नरकका नाम नहीं सुना था ॥ ६ ॥
ययातिरुवाच
ऊर्ध्वं देहात् कर्मणा जृम्भमाणाद् व्यक्तं पृथिव्यामनुसंचरन्ति । इमं भौमं नरकं ते पतन्ति नावेक्षन्ते वर्षपूगाननेकान् ॥ ७ ॥ **ययाति बोले—**कर्मसे उत्पन्न होने और बढ़नेवाले शरीरको पाकर गर्भसे निकलनेके पश्चात् जीव सबके समक्ष इस पृथ्वीपर (विषयोंमें) विचरते हैं। उनका यह विचरण ही भौम नरक कहा गया है। इसीमें वे पड़ते हैं। इसमें पड़नेपर वे व्यर्थ बीतनेवाले अनेक वर्षसमूहोंकी ओर दृष्टिपात नहीं करते ॥ ७ ॥