भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 707, कुल 2256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 707

भीष्मः खलु पितुः प्रियचिकीर्षया सत्यवतीं मातरमुदवाहयत्; यामाहुर्गन्धकालीति ॥ ४८ ॥ भीष्मने अपने पिताका प्रिय करनेकी इच्छासे उनके साथ माता सत्यवतीका विवाह कराया; जिसे गन्धकाली भी कहते हैं ॥ ४८ ॥

तस्यां पूर्वं कानीनो गर्भः पराशराद् द्वैपायनोऽभवत् । तस्यामेव शान्तनोरन्यौ द्वौ पुत्रौ बभूवतुः ॥ ४९ ॥ सत्यवतीके गर्भसे पहले कन्यावस्थामें महर्षि पराशरसे द्वैपायन व्यास उत्पन्न हुए थे। फिर उसी सत्यवतीके राजा शान्तनुद्वारा दो पुत्र और हुए ॥ ४९ ॥

विचित्रवीर्यश्चित्राङ्गदश्च । तयोरप्राप्तयौवन एव चित्राङ्गदो गन्धर्वेण हतः; विचित्रवीर्यस्तु राजाऽऽसीत् ॥ ५० ॥ जिनका नाम था, विचित्रवीर्य और चित्रांगद। उनमेंसे चित्रांगद युवावस्थामें पदार्पण करनेसे पहले ही एक गन्धर्वके द्वारा मारे गये; परंतु विचित्रवीर्य राजा हुए ॥ ५० ॥

विचित्रवीर्यः खलु कौसल्यात्मजे अम्बिकाम्बालिके काशिराजदुहितरावुपयेमे ॥ ५१ ॥ विचित्रवीर्यने अम्बिका और अम्बालिकासे विवाह किया। वे दोनों काशिराजकी पुत्रियाँ थीं और उनकी माताका नाम कौसल्या था ॥ ५१ ॥

विचित्रवीर्यस्त्वनपत्य एव विदेहत्वं प्राप्तः । ततः सत्यवत्यचिन्तयन्मा दौष्यन्तो वंश उच्छेदं व्रजेदिति ॥ ५२ ॥ विचित्रवीर्यके अभी कोई संतान नहीं हुई थी, तभी उनका देहावसान हो गया। तब सत्यवतीको यह चिन्ता हुई कि 'राजा दुष्यन्तका यह वंश नष्ट न हो जाय' ॥ ५२ ॥

सा द्वैपायनमृषिं मनसा चिन्तयामास । स तस्याः पुरतः स्थितः, किं करवाणीति ॥ ५३ ॥ उसने मन-ही-मन द्वैपायन महर्षि व्यासका चिन्तन किया। फिर तो व्यासजी उसके आगे प्रकट हो गये और बोले—'क्या आज्ञा है?' ॥ ५३ ॥

सा तमुवाच—भ्राता तवानपत्य एव स्वर्ग्यतो विचित्रवीर्यः । साध्वपत्यं तस्योत्पादयेति ॥ ५४ ॥ सत्यवतीने उनसे कहा—'बेटा! तुम्हारे भाई विचित्रवीर्य संतानहीन अवस्थामें ही स्वर्गवासी हो गये। अतः उनके वंशकी रक्षाके लिये उत्तम संतान उत्पन्न करो' ॥ ५४ ॥

स तथेत्युक्त्वा त्रीन् पुत्रानुत्पादयामास; धृतराष्ट्रं पाण्डुं विदुरं चेति ॥ ५५ ॥ उन्होंने 'तथास्तु' कहकर धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर—इन तीन पुत्रोंको उत्पन्न किया ॥ ५५ ॥

तत्र धृतराष्ट्रस्य राज्ञः पुत्रशतं बभूव गान्धार्यां वरदानाद् द्वैपायनस्य ॥ ५६ ॥