महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमनुष्यलोकमें तुम्हारे प्रतिकूल आचरण करेगी ।। ६-७ ।। यदा ते भविता मन्युस्तदा शापाद् विमोक्ष्यसे । 'जब तुम्हें गंगापर क्रोध आ जायगा, तब तुम भी शापसे छूट जाओगे।'
वैशम्पायन उवाच
स चिन्तयित्वा नृपतिर्नृपानन्यांस्तपोधनान् ।। ८ ।। प्रतीपं रोचयामास पितरं भूरितेजसम् । महाभिषं तु तं दृष्ट्वा नदी धैर्याच्च्युतं नृपम् ।। ९ ।। तमेव मनसा ध्यायन्त्युपावर्तत् सरिद्वरा । सा तु विध्वस्तवपुषः कश्मलाभिहतान् नृप ।। १० ।। ददर्श पथि गच्छन्ती वसून् देवान् दिवौकसः । तथारूपांश्च तान् दृष्ट्वा पप्रच्छ सरितां वरा ।। ११ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तब राजा महाभिषने अन्य बहुत-से तपस्वी राजाओंका चिन्तन करके महातेजस्वी राजा प्रतीपको ही अपना पिता बनानेके योग्य चुना—उन्हींको पसंद किया। महानदी गंगा राजा महाभिषको धैर्य खोते देख मन-ही-मन उन्हींका चिन्तन करती हुई लौटी। मार्गसे जाती हुई गंगाने वसुदेवताओंको देखा। उनका शरीर स्वर्गसे नीचे गिर रहा था। वे मोहाच्छन्न एवं मलिन दिखायी दे रहे थे। उन्हें इस रूपमें देखकर नदियोंमें श्रेष्ठ गंगाने पूछा— ।। ८—११ ।।
किमिदं नष्टरूपाः स्थ कच्चित् क्षेमं दिवौकसाम् । तामूचुर्वसवो देवाः शप्ताः स्मो वै महानदि ।। १२ ।। अल्पेऽपराधे संरम्भाद् वसिष्ठेन महात्मना । विमूढा हि वयं सर्वे प्रच्छन्नमृषिसत्तमम् ।। १३ ।। संध्यां वसिष्ठमासीनं तमत्यभिस्रुताः पुरा । तेन कोपाद् वयं शप्ता योनौ सम्भवतेति ह ।। १४ ।।
तुमलोगोंका दिव्य रूप नष्ट कैसे हो गया? देवता सकुशल तो हैं न? तब वसुदेवताओंने गंगासे कहा—'महानदी! महात्मा वसिष्ठने थोड़े-से अपराधपर क्रोधमें आकर हमें शाप दे दिया है। पहलेकी बात है एक दिन जब वसिष्ठजी पेड़ोंकी आड़में संध्योपासना कर रहे थे, हम सब मोहवश उनका उल्लंघन करके चले गये (और उनकी धेनुका अपहरण कर लिया)। इससे कुपित होकर उन्होंने हमें शाप दिया कि 'तुमलोग मनुष्ययोनिमें जन्म लो' ।। १२—१४ ।।
न निवर्तयितुं शक्यं यदुक्तं ब्रह्मवादिना । त्वमस्मान् मानुषी भूत्वा सृज पुत्रान्-वसून् भुवि ।। १५ ।।