भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 717

नास्य मोघः संगमः स्यात् पुत्रहेतोर्मया सह ॥ २० ॥ **गंगाजीने कहा—**ठीक है, मैं ऐसा ही करूँगी; परंतु उस राजाका मेरे साथ पुत्रके लिये किया हुआ सम्बन्ध व्यर्थ न हो जाय, इसलिये उनके लिये एक पुत्रकी भी व्यवस्था होनी चाहिये ॥ २० ॥

वसव ऊचुः तुरीयार्धं प्रदास्यामो वीर्यस्यैकैकशो वयम् । तेन वीर्येण पुत्रस्ते भविता तस्य चेप्सितः ॥ २१ ॥ **वसुगण बोले—**हम सब लोग अपने तेजका एक-एक अष्टमांश देंगे। उस तेजसे जो तुम्हारा एक पुत्र होगा, वह उस राजाकी इच्छाके अनुरूप होगा ॥ २१ ॥ न सम्पत्स्यति मर्त्येषु पुनस्तस्य तु संततिः । तस्मादपुत्रः पुत्रस्ते भविष्यति स वीर्यवान् ॥ २२ ॥ किंतु मर्त्यलोकमें उसकी कोई संतान न होगी। अतः तुम्हारा वह पुत्र संतानहीन होनेके साथ ही अत्यन्त पराक्रमी होगा ॥ २२ ॥ एवं ते समयं कृत्वा गङ्गया वसवः सह । जग्मुः संहृष्टमनसो यथासंकल्पमञ्जसा ॥ २३ ॥ इस प्रकार गंगाजीके साथ शर्त करके वसुगण प्रसन्नतापूर्वक अपनी इच्छाके अनुसार चले गये ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि महाभिषोपाख्याने षण्णवतितमोऽध्यायः ॥ ९६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें महाभिषोपाख्यानविषयक छानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९६ ॥