महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 726, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टावजनयत् पुत्रांस्तस्याममरसंनिभान् ॥ १२ ॥ उसके साथ इच्छानुसार रमण करते हुए महाराज शान्तनुने उसके गर्भसे देवताओंके समान तेजस्वी आठ पुत्र उत्पन्न किये ॥ १२ ॥
जातं जातं च सा पुत्रं क्षिपत्यम्भसि भारत । प्रीणाम्यहं त्वामित्युक्त्वा गङ्गा स्रोतस्यमज्जयत् ॥ १३ ॥ भारत! जो-जो पुत्र उत्पन्न होता, उसे वह गंगाजीके जलमें फेंक देती और कहती—'(वत्स! इस प्रकार शापसे मुक्त करके) मैं तुम्हें प्रसन्न कर रही हूँ।' ऐसा कहकर गंगा प्रत्येक बालकको धारामें डुबो देती थी ॥ १३ ॥
तस्य तन्न प्रियं राज्ञः शान्तनोरभवत् तदा । न च तां किंचनोवाच त्यागाद् भीतो महीपतिः ॥ १४ ॥ पत्नीका यह व्यवहार राजा शान्तनुको अच्छा नहीं लगता था, तो भी वे उस समय उससे कुछ नहीं कहते थे। राजाको यह डर बना हुआ था कि कहीं यह मुझे छोड़कर चली न जाय ॥ १४ ॥
अथैनामष्टमे पुत्रे जाते प्रहसतीमिव । उवाच राजा दुःखार्तः परीप्सन् पुत्रमात्मनः ॥ १५ ॥ तदनन्तर जब आठवाँ पुत्र उत्पन्न हुआ, तब हँसती हुई-सी अपनी स्त्रीसे राजाने अपने पुत्रका प्राण बचानेकी इच्छासे दुःखातुर होकर कहा— ॥ १५ ॥
मा वधीः कस्य कासीति किं हिनत्सि सुतानिति । पुत्रघ्नि सुमहत् पापं सम्प्राप्तं ते सुगर्हितम् ॥ १६ ॥ 'अरी! इस बालकका वध न कर, तू किसकी कन्या है? कौन है? क्यों अपने ही बेटोंको मारे डालती है। पुत्रघातिनि! तुझे पुत्रहत्याका यह अत्यन्त निन्दित और भारी पाप लगा है' ॥ १६ ॥
स्त्र्युवाच
पुत्रकाम न ते हन्मि पुत्रं पुत्रवतां वर । जीर्णस्तु मम वासोऽयं यथा स समयः कृतः ॥ १७ ॥ स्त्री बोली—पुत्रकी इच्छा रखनेवाले नरेश! तुम पुत्रवानोंमें श्रेष्ठ हो। मैं तुम्हारे इस पुत्रको नहीं मारूँगी; परंतु यहाँ मेरे रहनेका समय अब समाप्त हो गया; जैसी कि पहले ही शर्त हो चुकी है ॥ १७ ॥
अहं गङ्गा जह्नुसुता महर्षिगणसेविता । देवकार्यार्थसिद्धयर्थमुषिताहं त्वया सह ॥ १८ ॥ मैं जह्नुकी पुत्री और महर्षियोंद्वारा सेवित गंगा हूँ। देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये तुम्हारे साथ रह रही थी ॥ १८ ॥